प्रशासनिक अंधेरगर्दी: नियम बाद में, प्रवेश पहले! संभागायुक्त की अध्यक्षता वाली ऑटोनॉमस सोसायटी को भनक तक नहीं; छात्रों का भविष्य दांव पर
जबलपुर। विशेष खोजी ब्यूरो
संस्कारधानी के प्रतिष्ठित नेताजी सुभाषचंद्र बोस (NSCB) मेडिकल कॉलेज में पैरामेडिकल पाठ्यक्रमों के दाखिले में एक ऐसा ‘प्रशासनिक झोल’ और महा-घोटाला सामने आया है, जिसने पूरे चिकित्सा शिक्षा विभाग को हिलाकर रख दिया है। आरोप है कि मेडिकल कॉलेज प्रबंधन ने तानाशाही रवैया अपनाते हुए, बिना किसी वैधानिक नियमावली (रूल्स) और बिना ऑटोनॉमस सोसायटी (स्वशासी समिति) की आवश्यक स्वीकृति के ही धड़ल्ले से विद्यार्थियों को प्रवेश दे दिए। सवाल यह उठ रहा है कि जब किसी खेल के नियम ही तय नहीं थे, तो अंपायर (प्रबंधन) ने खेल कैसे शुरू करवा दिया? जब प्रवेश प्रक्रिया की वैधानिक आधारशिला ही गायब थी, तो आखिर किस गुप्त आदेश या मेहरबानी के तहत ये दाखिले किए गए? इस पूरे घालमेल के बाद अब समूची प्रवेश प्रक्रिया गहरे संदेह और जांच के दायरे में आ गई है।
क्या है ऑटोनॉमस सोसायटी का नियम और कहाँ हुआ ‘झोल’?
चिकित्सा शिक्षा विभाग के स्थापित नियमों के मुताबिक, पैरामेडिकल पाठ्यक्रमों के संचालन, फीस निर्धारण और सीटों के आवंटन के लिए सबसे पहले ऑटोनॉमस सोसायटी (स्वशासी समिति) के माध्यम से एक विस्तृत नियमावली तैयार की जानी अनिवार्य होती है।
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कहाँ हुई चूक: इस अति-महत्वपूर्ण स्वशासी समिति के अध्यक्ष स्वयं संभागायुक्त (कमिश्नर) होते हैं।
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प्रबंधन की लापरवाही: नियमानुसार, पाठ्यक्रम संचालन का वैधानिक प्रस्ताव, उसकी अनुमति और नियमों का पूरा खाका तैयार कर समिति के समक्ष रखने की जिम्मेदारी मेडिकल कॉलेज प्रबंधन और डीन की होती है। लेकिन हैरानी की बात यह है कि छात्रों से मोटी फीस वसूल कर पूरी प्रवेश प्रक्रिया संपन्न करा ली गई, लेकिन वह ‘नियमावली’ आज तक सिर्फ कागजों में ही ढूंढने से नहीं मिल रही है।
सवालों के घेरे में ‘डीन’: प्रस्ताव रखने के बजाय सीधे थमा दिए दाखिले?
सूत्रों से मिली पुख्ता जानकारी के अनुसार, इस पूरे मामले में मेडिकल कॉलेज के डीन (Dean) की भूमिका पर सबसे गंभीर प्रश्नचिह्न लग रहे हैं। नए पाठ्यक्रमों के संचालन की वैधानिक अनुमतियां और प्रस्तावों को आगे बढ़ाने का सर्वोच्च जिम्मा डीन का ही होता है।
खोजी सवाल: डीन द्वारा यह प्रस्ताव ऑटोनॉमस सोसायटी के समक्ष क्यों नहीं रखा गया? संभागायुक्त की अध्यक्षता वाली समिति को अंधेरे में रखकर बैकडोर से यह पूरी प्रक्रिया क्यों पूरी की गई? क्या किसी ऊपरी दबाव में या चहेतों को उपकृत करने के लिए ‘नियम बाद में, प्रवेश पहले’ की इस अनूठी और अवैध नीति को अंजाम दिया गया?
5 एकड़ भूमि और अधोसंरचना का ‘रहस्यमयी’ खेल
मामले की परतें यहीं नहीं रुकतीं। सूत्रों का दावा है कि पैरामेडिकल पाठ्यक्रमों के संचालन के लिए काउंसिल और सरकार द्वारा तय किए गए अधोसंरचना (Infrastructure) और भूमि संबंधी कड़े मानकों को भी पूरी तरह ठंडे बस्ते में डाल दिया गया।
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चर्चा है कि इस तरह के विशेषज्ञ पाठ्यक्रमों के संचालन के लिए कॉलेज के पास पर्याप्त स्वीकृत भूमि (लगभग 5 एकड़) और आवश्यक संसाधनों का भौतिक विवरण प्रस्तुत करना अनिवार्य होता है।
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अब यह भी जांच का बड़ा विषय बन गया है कि क्या इन मानकों की केवल ‘कागजी खानापूर्ति’ की गई थी या हकीकत में संसाधन मौजूद ही नहीं हैं? क्या बिना निरीक्षण और मापदंडों को पूरा किए ही आंखें मूंदकर हरी झंडी दे दी गई?
मासूम छात्रों का क्या कसूर? अधर में लटका भविष्य!
शिक्षा और कानूनी विशेषज्ञों का साफ कहना है कि यदि किसी भी तकनीकी या चिकित्सा पाठ्यक्रम की प्रवेश प्रक्रिया वैधानिक नियमों के अनुरूप नहीं हुई है, तो भविष्य में उसकी पूरी वैधता (Validity) शून्य मानी जा सकती है।
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परीक्षा और पंजीयन पर संकट: बिना नियमावली के प्रवेश पाने वाले इन छात्रों की परीक्षाओं के आयोजन, उनके परिणाम और सबसे महत्वपूर्ण—मध्य प्रदेश सह-चिकित्सीय परिषद (Paramedical Council) में उनके पंजीयन (Registration) पर तलवार लटक गई है।
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डिग्री बनेगी रद्दी का टुकड़ा: यदि काउंसिल ने इस अवैध प्रक्रिया के कारण मान्यता रोकने का फैसला किया, तो छात्रों की लाखों रुपए की फीस डूब जाएगी और उनकी डिग्री महज़ रद्दी का टुकड़ा बनकर रह जाएगी।
इन 5 तीखे सवालों के जवाब दे मेडिकल कॉलेज प्रबंधन (जांच की मांग):
इस कथित घोटाले के उजागर होने के बाद अब शहर के प्रबुद्ध नागरिकों और छात्र संगठनों ने इस पर उच्च स्तरीय और पारदर्शी जांच की मांग तेज कर दी है। जनता और छात्र प्रबंधन से ये सीधे सवाल पूछ रहे हैं:
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सवाल नं. 1: बिना लिखित और स्वीकृत नियमावली के, किस सक्षम अधिकारी के आदेश पर प्रवेश प्रक्रिया शुरू की गई?
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सवाल नं. 2: क्या ऑटोनॉमस सोसायटी और उसके अध्यक्ष (संभागायुक्त) से इस संबंध में कोई लिखित पूर्व-स्वीकृति ली गई थी? यदि हाँ, तो वह आदेश सार्वजनिक क्यों नहीं किया जा रहा?
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सवाल नं. 3: नियमों को ताक पर रखकर छात्रों का भविष्य दांव पर लगाने वाले इस पूरे खेल का असली ‘मास्टरमाइंड’ कौन सा अधिकारी है?
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सवाल नं. 4: क्या भूमि (5 एकड़) और इंफ्रास्ट्रक्चर के मानकों का भौतिक सत्यापन (Physical Verification) किया गया था या केवल टेबल-मंथन कर फाइल पास कर दी गई?
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सवाल नं. 5: यदि भविष्य में काउंसिल ने इस बैच को अवैध घोषित कर दिया, तो छात्रों के समय और पैसों की बर्बादी की भरपाई क्या दोषी अधिकारियों की जेब से की जाएगी?
यदि चिकित्सा शिक्षा विभाग और शासन ने समय रहते इस गंभीर प्रशासनिक विफलता पर संज्ञान नहीं लिया, तो जबलपुर मेडिकल कॉलेज का यह पैरामेडिकल प्रवेश विवाद एक बड़े आंदोलन का रूप ले सकता है, जिसकी पूरी गाज अंततः उन मासूम छात्र-छात्राओं पर गिरेगी जिन्होंने अपने सुनहरे भविष्य की उम्मीद में यहाँ दाखिला लिया है।
