मेडिकल यूनिवर्सिटी के तीन टुकड़े! 120 करोड़ का अतिरिक्त बोझ, फिर भी क्यों अड़ा है सरकार का प्लान?
जबलपुर। मध्यप्रदेश की एकमात्र मेडिकल यूनिवर्सिटी को तीन हिस्सों में बांटने की तैयारी ने नया विवाद खड़ा कर दिया है। प्रस्ताव के मुताबिक जबलपुर, भोपाल और उज्जैन में अलग-अलग मेडिकल यूनिवर्सिटी बनाई जाएंगी। हालांकि अभी अंतिम फैसला नहीं हुआ है, लेकिन इस कवायद से हर साल करीब 120 करोड़ रुपए का अतिरिक्त वित्तीय बोझ बढ़ने की आशंका जताई जा रही है।
सूत्रों के मुताबिक पहले 9 मई को इस संबंध में अहम बैठक प्रस्तावित थी, लेकिन वह टल गई। अब शासन स्तर पर तीन के बजाय दो यूनिवर्सिटी बनाने के विकल्प पर भी मंथन चल रहा है। बावजूद इसके मुख्यमंत्री की मंशा के अनुरूप तीन यूनिवर्सिटी मॉडल पर काम जारी बताया जा रहा है।
आय 75 करोड़, खर्च बढ़कर 150 करोड़!
मौजूदा मेडिकल यूनिवर्सिटी संबद्धता शुल्क, परीक्षा शुल्क, नामांकन, प्रकाशन और अन्य स्रोतों से सालाना लगभग 70 से 75 करोड़ रुपए की आय अर्जित करती है। वहीं वर्तमान संचालन पर औसतन 30 से 40 करोड़ रुपए खर्च होते हैं।
लेकिन यदि तीन यूनिवर्सिटी का मॉडल लागू हुआ तो नई व्यवस्थाओं, भवनों, कर्मचारियों और प्रशासनिक ढांचे पर सालाना 150 करोड़ रुपए तक खर्च होने का अनुमान है। यानी वर्तमान व्यवस्था की तुलना में सरकार पर भारी अतिरिक्त वित्तीय भार पड़ेगा।
जबलपुर का दायरा होगा सीमित
प्रस्ताव के अनुसार जबलपुर मेडिकल यूनिवर्सिटी के अंतर्गत केवल 14 जिले रह जाएंगे, जिनमें रीवा, सतना, सिंगरौली, शहडोल, छिंदवाड़ा, सिवनी, मंडला, बालाघाट, उमरिया, डिंडोरी, सीधी, पन्ना और टीकमगढ़ जैसे जिले शामिल होंगे।
वहीं भोपाल और उज्जैन को 18-18 जिलों का दायरा देने की तैयारी है।
सरकार का तर्क: काम होगा आसान
शासन का कहना है कि मेडिकल शिक्षा का तेजी से विस्तार हुआ है। मेडिकल, डेंटल, आयुष, होम्योपैथी और पैरामेडिकल संस्थानों की संख्या लगातार बढ़ रही है। ऐसे में क्षेत्रीय स्तर पर यूनिवर्सिटी बनने से—
- छात्रों को राहत मिलेगी
- परीक्षा और परिणाम प्रक्रिया तेज होगी
- रिसर्च और ट्रेनिंग को बढ़ावा मिलेगा
- अकादमिक मॉनिटरिंग आसान होगी
- स्थानीय स्तर पर समस्याओं का समाधान होगा
विरोध के सुर भी तेज
विशेषज्ञों और विश्वविद्यालय से जुड़े कुछ लोगों का मानना है कि विभाजन से फायदे कम और नुकसान ज्यादा हो सकते हैं।
प्रमुख आपत्तियां
- हर साल करोड़ों रुपए का अतिरिक्त खर्च
- नए कर्मचारियों और संसाधनों की जरूरत
- प्रशासनिक समन्वय में कमी
- अलग-अलग यूनिवर्सिटी में कार्यप्रणाली का अंतर
- मेडिकल यूनिवर्सिटी अधिनियम-2011 में संशोधन की आवश्यकता
- राजनीतिक कारणों से निर्णय लेने के आरोप
आलोचकों का कहना है कि जब वर्तमान विश्वविद्यालय में ही कई पद प्रतिनियुक्ति से संचालित हो रहे हैं, तब तीन अलग संस्थानों का ढांचा खड़ा करना चुनौतीपूर्ण होगा।
अभी फैसला बाकी
विश्वविद्यालय प्रशासन का कहना है कि मेडिकल यूनिवर्सिटी के विभाजन का प्रस्ताव अभी विचाराधीन है और इस पर अंतिम निर्णय नहीं हुआ है। हालांकि शासन स्तर पर चर्चा तेज होने से मेडिकल शिक्षा जगत में इस मुद्दे को लेकर उत्सुकता और चिंता दोनों बढ़ गई हैं।
अब सबसे बड़ा सवाल यही है— क्या मेडिकल शिक्षा के विकेंद्रीकरण के नाम पर प्रदेश को हर साल 120 करोड़ रुपए का अतिरिक्त बोझ उठाना पड़ेगा, या सरकार कोई नया फॉर्मूला लेकर आएगी?
