वकील की लापरवाही पर हाईकोर्ट का अनोखा संदेश, जुर्माने की जगह ‘संवेदनशीलता’ की सजा: दृष्टिबाधित बच्चों के बीच बिताना होगा एक घंटा

याचिका बहाल करने से पहले दृष्टिबाधित बच्चों के बीच बिताना होगा एक घंटा, रिपोर्ट देने पर ही मिलेगी सुनवाई

हाईकोर्ट बोला—वकील की गलती की कीमत गरीब पक्षकार क्यों चुकाए? अब न्याय के साथ सामाजिक जिम्मेदारी भी जरूरी

जबलपुर | विशेष संवाददाता

अदालतों में कई बार ऐसा होता है कि अधिवक्ताओं की अनुपस्थिति या लापरवाही के कारण वर्षों से लंबित मामले केवल “वांट ऑफ प्रॉसिक्यूशन” के आधार पर खारिज हो जाते हैं। सबसे अधिक नुकसान उस पक्षकार को होता है, जिसका अपने मामले की पैरवी में कोई दोष नहीं होता। मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने अब इसी व्यवस्था पर गंभीर टिप्पणी करते हुए ऐसा आदेश पारित किया है, जिसे न्यायिक व्यवस्था में एक नई सोच के रूप में देखा जा रहा है।

हाईकोर्ट ने स्पष्ट कहा कि अधिवक्ता की गलती का खामियाजा गरीब, असहाय या आम पक्षकार को नहीं भुगतना चाहिए। इसलिए एक मामले में याचिका बहाल करने के लिए केवल जुर्माना लगाने के बजाय सामुदायिक सेवा (कम्युनिटी सर्विस) की शर्त लगाई गई।

मामले की सुनवाई जस्टिस आनंद पाठक और जस्टिस बी.पी. शर्मा की खंडपीठ ने की।

जुर्माना नहीं… समाज के बीच जाकर सीखने का आदेश

मामला एक ऐसी याचिका से जुड़ा था, जो अधिवक्ताओं की अनुपस्थिति के कारण खारिज हो गई थी। याचिका की बहाली स्वीकार करते हुए हाईकोर्ट ने अधिवक्ता को निर्देश दिया कि वह 15 दिनों के भीतर जबलपुर स्थित शासकीय दृष्टिबाधित उच्चतर माध्यमिक विद्यालय जाएं।

उन्हें वहां विद्यार्थियों के लिए लगभग 2,500 रुपये मूल्य के खाद्य पदार्थ और स्नैक्स लेकर जाना होगा तथा बच्चों के बीच कम से कम एक घंटा बिताना होगा।

लेकिन अदालत यहीं नहीं रुकी।

सिर्फ जाना नहीं, अनुभव भी लिखना होगा

हाईकोर्ट ने आदेश दिया कि विद्यालय भ्रमण के बाद अधिवक्ता को अपने अनुभव, वहां की व्यवस्थाओं, विद्यार्थियों की स्थिति और सुधार संबंधी सुझावों सहित विस्तृत रिपोर्ट एवं शपथ पत्र न्यायालय में प्रस्तुत करना होगा।

यानी केवल औपचारिक उपस्थिति नहीं, बल्कि सामाजिक सरोकारों को समझने और उसे रिकॉर्ड पर लाने की जिम्मेदारी भी दी गई है।

इसी रिपोर्ट के बाद संबंधित याचिका को पुनः सुनवाई के लिए बहाल किया जाएगा।

“कमतर ईश्वर की संतान नहीं”

अपने आदेश में अदालत ने एक महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि दृष्टिबाधित बच्चों को कभी यह महसूस नहीं होना चाहिए कि वे “किसी कमतर ईश्वर की संतान” हैं।

खंडपीठ ने कहा कि समाज के सक्षम और शिक्षित वर्ग का इन संस्थानों तक पहुंचना केवल सेवा नहीं, बल्कि सामाजिक विश्वास मजबूत करने का माध्यम भी है।

हाईकोर्ट ने क्यों उठाया सोशल ऑडिट का मुद्दा?

इस आदेश की सबसे महत्वपूर्ण बात केवल एक याचिका की बहाली नहीं, बल्कि अदालत द्वारा सोशल ऑडिट की अवधारणा को आगे बढ़ाना है।

हाईकोर्ट ने कहा कि अनाथालयों, वृद्धाश्रमों, शेल्टर होम और दिव्यांग संस्थानों में समय-समय पर दुर्व्यवहार, लापरवाही और अनियमितताओं की शिकायतें सामने आती रहती हैं।

यदि डॉक्टर, वकील, चार्टर्ड अकाउंटेंट, प्रशासनिक अधिकारी और समाज के अन्य जिम्मेदार लोग नियमित रूप से इन संस्थानों का निरीक्षण करें, तो वहां पारदर्शिता और जवाबदेही स्वतः बढ़ेगी।

सरकार को भी दिए निर्देश

मामले को केवल न्यायालय तक सीमित न रखते हुए हाईकोर्ट ने आदेश की प्रति मुख्य सचिव, महिला एवं बाल विकास विभाग तथा सामाजिक न्याय विभाग को भी भेजने के निर्देश दिए हैं।

साथ ही अपेक्षा जताई है कि राज्य सरकार ऐसी संस्थाओं में नियमित सामाजिक अंकेक्षण (सोशल ऑडिट) की नीति तैयार करे।

न्याय व्यवस्था में नई सोच

कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह आदेश दंड देने से अधिक सामाजिक चेतना विकसित करने पर केंद्रित है। अदालत ने यह संदेश देने का प्रयास किया है कि न्याय केवल अदालत की चारदीवारी तक सीमित नहीं है, बल्कि समाज के कमजोर वर्गों के प्रति संवेदनशीलता भी न्याय का महत्वपूर्ण हिस्सा है।

अब चर्चा इस बात की

हाईकोर्ट के इस आदेश ने एक नई बहस को जन्म दिया है कि क्या भविष्य में ऐसे मामलों में केवल आर्थिक दंड के बजाय सामाजिक उत्तरदायित्व आधारित दंड को भी प्राथमिकता दी जानी चाहिए।

फिलहाल इतना तय है कि इस आदेश ने यह स्पष्ट कर दिया है कि वकील की लापरवाही की सजा अब केवल जुर्माना नहीं, बल्कि समाज के प्रति जिम्मेदारी निभाकर भी चुकानी पड़ सकती है।

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