सुनवाई के बिना न्याय नहीं” — हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी: हाईकोर्ट ने पलटा विशेष अदालत का फैसला

जबलपुर। सागर जिले के बहुचर्चित नीलेश आदिवासी मौत मामले में मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण हस्तक्षेप करते हुए विशेष अदालत के उस आदेश को निरस्त कर दिया है, जिसमें एसआईटी की क्लोजर रिपोर्ट को खारिज कर दिया गया था। हाईकोर्ट ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि किसी भी न्यायिक निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले सभी संबंधित पक्षों को सुनवाई का अवसर देना अनिवार्य है। यदि ऐसा नहीं किया जाता, तो न्यायिक प्रक्रिया की निष्पक्षता पर प्रश्नचिन्ह लगना स्वाभाविक है।

जस्टिस हिमांशु जोशी की एकलपीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि “न्याय केवल अंतिम आदेश में नहीं, बल्कि पूरी प्रक्रिया में दिखाई देना चाहिए।” अदालत ने ट्रायल कोर्ट को निर्देश दिया है कि वह सभी पक्षों को सुनने के बाद एसआईटी की क्लोजर रिपोर्ट पर नए सिरे से विचार करे।

आखिर क्या है पूरा मामला?

नीलेश आदिवासी की मौत का मामला पिछले कई महीनों से प्रदेश की राजनीति और प्रशासनिक हलकों में चर्चा का विषय बना हुआ है। मृतक की पत्नी रेवा आदिवासी ने गंभीर आरोप लगाते हुए दावा किया था कि उसके पति को राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता का मोहरा बनाया गया।

याचिका के अनुसार, नीलेश से कथित तौर पर सत्तारूढ़ दल के विधायक भूपेंद्र सिंह के समर्थकों द्वारा मालथौन के नेता गोविंद सिंह राजपूत के खिलाफ झूठी एफआईआर दर्ज कराई गई थी। बाद में जब नीलेश ने कथित साजिश का खुलासा किया, शपथपत्र दिया और वीडियो संदेश के जरिए सार्वजनिक रूप से बयान रखा, तब से उसके ऊपर दबाव बढ़ने लगा।

रेवा आदिवासी का आरोप है कि इसके बाद नीलेश को धमकियां दी गईं, उसका अपहरण किया गया, प्रताड़ित किया गया और अंततः 25 जुलाई 2025 को संदिग्ध परिस्थितियों में उसकी मौत हो गई।

पुलिस जांच पर भी उठे थे सवाल

याचिकाकर्ता का आरोप था कि मामले में पर्याप्त साक्ष्य मौजूद होने के बावजूद पुलिस ने विधिवत एफआईआर दर्ज नहीं की और पूरे प्रकरण को दबाने की कोशिश की गई। यही वजह रही कि मामले में स्वतंत्र जांच एजेंसी से जांच कराने और सीबीआई जांच की मांग उठी।

मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए यह विवाद स्थानीय स्तर से निकलकर सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गया।

सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर बनी थी एसआईटी

इस मामले में आरोपी बनाए गए गोविंद सिंह राजपूत की जमानत याचिका पर सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने विशेष जांच दल (एसआईटी) गठित करने के निर्देश दिए थे।

एसआईटी ने लंबी जांच के बाद अपनी क्लोजर रिपोर्ट सागर की विशेष अदालत में प्रस्तुत की। लेकिन 18 मार्च 2026 को विशेष अदालत ने रिपोर्ट को स्वीकार करने से इनकार करते हुए उसे खारिज कर दिया था।

यहीं से कानूनी लड़ाई का नया अध्याय शुरू हुआ और गोविंद सिंह राजपूत ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।

हाईकोर्ट ने किस आधार पर पलटा आदेश?

हाईकोर्ट ने मामले के गुण-दोष पर कोई अंतिम टिप्पणी नहीं की, बल्कि न्यायिक प्रक्रिया की वैधता पर सवाल उठाए।

अदालत ने कहा कि क्लोजर रिपोर्ट स्वीकार या अस्वीकार करने जैसे महत्वपूर्ण निर्णय से पहले संबंधित पक्षों को सुनवाई का अवसर दिया जाना चाहिए था। यदि ऐसा नहीं किया गया तो यह प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन माना जाएगा।

यानी हाईकोर्ट ने यह नहीं कहा कि एसआईटी की रिपोर्ट सही है या गलत, बल्कि यह कहा कि रिपोर्ट पर निर्णय लेने की प्रक्रिया कानूनी रूप से त्रुटिपूर्ण थी।

अब आगे क्या होगा?

हाईकोर्ट के आदेश के बाद मामला एक बार फिर विशेष अदालत के पास पहुंच गया है। अब अदालत को सभी पक्षों—याचिकाकर्ता, आरोपित पक्ष और जांच एजेंसी—को सुनने के बाद एसआईटी की क्लोजर रिपोर्ट पर नया निर्णय लेना होगा।

इसका मतलब यह है कि मामला अभी समाप्त नहीं हुआ है, बल्कि जांच और न्यायिक समीक्षा का एक महत्वपूर्ण चरण अभी बाकी है।

राजनीतिक और कानूनी हलकों की नजर

नीलेश आदिवासी मौत मामला पहले ही राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप का केंद्र रहा है। ऐसे में हाईकोर्ट के ताजा आदेश ने एक बार फिर इस प्रकरण को सुर्खियों में ला दिया है।

अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि विशेष अदालत दोबारा सुनवाई के बाद एसआईटी की क्लोजर रिपोर्ट को स्वीकार करती है या उसे फिर से खारिज करती है। आने वाले दिनों में यह मामला प्रदेश की राजनीति और न्यायिक व्यवस्था दोनों के लिए अहम साबित हो सकता है।

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