ओरछा के विश्व प्रसिद्ध मंदिर से जुड़ी कथित अनियमितताओं के मामले में बड़ा फैसला, अदालत बोली- किसी नागरिक को अनिश्चितकाल तक आरोपी नहीं बनाया जा सकता
जबलपुर। ओरछा स्थित विश्व प्रसिद्ध श्री राम राजा सरकार मंदिर में कथित वित्तीय अनियमितताओं के मामले में मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने एक ऐसा फैसला सुनाया है, जिसने जांच एजेंसियों की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। अदालत ने मंदिर के लिपिक मुन्नालाल तिवारी के खिलाफ दर्ज एफआईआर को निरस्त करते हुए साफ कहा कि नौ वर्षों तक जांच पूरी न कर पाना न केवल प्रशासनिक विफलता है, बल्कि यह एक नागरिक के मौलिक अधिकारों का भी हनन है।
जस्टिस हिमान्शु जोशी की एकलपीठ ने अपने आदेश में कहा कि किसी व्यक्ति को वर्षों तक संदेह और आपराधिक जांच के दायरे में रखकर उसकी सामाजिक प्रतिष्ठा, मानसिक शांति और व्यक्तिगत स्वतंत्रता को प्रभावित नहीं किया जा सकता।
राम राजा मंदिर से शुरू हुआ मामला, लेकिन जांच नहीं पहुंची मंजिल तक
मामले की शुरुआत वर्ष 2017 में हुई थी। ओरछा के प्रसिद्ध राम राजा सरकार मंदिर में दान राशि, आभूषणों, मंदिर संपत्तियों और अभिलेखों में कथित गड़बड़ियों की शिकायतों के बाद एक संयुक्त जांच समिति गठित की गई थी।
समिति की रिपोर्ट के आधार पर 10 सितंबर 2017 को ओरछा थाना, जिला निवाड़ी में विभिन्न धाराओं के तहत एफआईआर दर्ज की गई। इस एफआईआर में मंदिर के लिपिक मुन्नालाल तिवारी को भी आरोपी बनाया गया था।
एफआईआर दर्ज होने के बाद उम्मीद थी कि जांच तेजी से आगे बढ़ेगी और आरोपों की सच्चाई सामने आएगी, लेकिन मामला वर्षों तक फाइलों में ही उलझा रहा।
सबसे बड़ा सवाल: नौ साल तक आखिर कर क्या रही थी जांच एजेंसी?
सुनवाई के दौरान अदालत के सामने यह तथ्य आया कि एफआईआर दर्ज होने के करीब नौ वर्ष बाद भी पुलिस जांच पूरी नहीं कर पाई थी। न आरोप-पत्र पेश हुआ, न जांच का तार्किक निष्कर्ष सामने आया।
यही तथ्य हाईकोर्ट की नाराजगी का प्रमुख कारण बना।
अदालत ने पूछा कि यदि किसी मामले में इतने वर्षों बाद भी जांच एजेंसी किसी निष्कर्ष तक नहीं पहुंच पाती, तो क्या एक नागरिक को अनिश्चितकाल तक आरोपी बनाकर रखा जा सकता है?
हाईकोर्ट की तीखी टिप्पणी
न्यायालय ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि—
“प्रशासनिक कठिनाइयां, दस्तावेजों का संकलन या अन्य तकनीकी कारण किसी आपराधिक जांच को वर्षों तक लंबित रखने का वैध आधार नहीं हो सकते।”
अदालत ने माना कि ऐसी देरी संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत प्रदत्त जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार का उल्लंघन है।
सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का भी दिया हवाला
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में सुप्रीम कोर्ट के विभिन्न निर्णयों का उल्लेख करते हुए कहा कि हर नागरिक को समयबद्ध और निष्पक्ष जांच का अधिकार है।
यदि जांच एजेंसियां वर्षों तक किसी मामले को लंबित रखती हैं और आरोपी को कानूनी अनिश्चितता में जीने को मजबूर करती हैं, तो यह न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग माना जाएगा।
आखिरकार एफआईआर ही रद्द
मामले में विस्तृत सुनवाई के बाद हाईकोर्ट ने मुन्नालाल तिवारी के खिलाफ दर्ज एफआईआर और उसके आधार पर चल रही समस्त कार्रवाई को निरस्त कर दिया।
अदालत ने कहा कि जांच में हुई असाधारण देरी को देखते हुए न्यायालय का हस्तक्षेप आवश्यक हो गया था और ऐसे मामलों में आरोपी के संवैधानिक अधिकारों की रक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता है।
फैसले से उठे बड़े सवाल
यह फैसला केवल एक एफआईआर निरस्त होने का मामला नहीं है। यह उन हजारों मामलों पर भी सवाल खड़ा करता है, जहां जांच वर्षों तक लंबित रहती है और आरोपी तथा शिकायतकर्ता दोनों ही न्याय की प्रतीक्षा करते रहते हैं।
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यदि जांच एजेंसियां समयबद्ध कार्रवाई नहीं करेंगी तो ऐसे मामलों में अदालतें लगातार हस्तक्षेप करती रहेंगी।
क्या है इस फैसले का संदेश?
हाईकोर्ट ने अपने फैसले से साफ संकेत दिया है कि—
- जांच एजेंसियां अनिश्चितकाल तक मामले लंबित नहीं रख सकतीं।
- नागरिकों के मौलिक अधिकार सर्वोपरि हैं।
- प्रशासनिक लापरवाही का खामियाजा किसी आरोपी को नहीं भुगतना चाहिए।
- समयबद्ध जांच न्याय व्यवस्था की बुनियादी शर्त है।
