जबलपुर। शहर के रामपुर क्षेत्र में सरकारी नजूल भूमि पर कथित अतिक्रमण और करोड़ों रुपये की व्यावसायिक गतिविधियों से जुड़े मामले ने अब न्यायिक मोड़ ले लिया है। आरोप है कि जिस व्यक्ति को वर्ष 1998 में महज 600 वर्गफीट जमीन का आवासीय पट्टा दिया गया था, उसने धीरे-धीरे आसपास की करीब 62 हजार वर्गफीट सरकारी भूमि पर कब्जा कर वहां विशाल व्यावसायिक निर्माण खड़ा कर दिया। मामला मध्यप्रदेश हाईकोर्ट पहुंचने के बाद अब प्रशासन और राजस्व विभाग की भूमिका भी सवालों के घेरे में आ गई है।
मामले की सुनवाई मंगलवार को एक्टिंग चीफ जस्टिस विवेक रूसिया और जस्टिस प्रदीप मित्तल की डिवीजन बेंच में हुई। प्रारंभिक सुनवाई के बाद अदालत ने राज्य शासन को नोटिस जारी कर जवाब तलब किया है। मामले की अगली सुनवाई 3 अगस्त को निर्धारित की गई है।
600 वर्गफीट से 62 हजार वर्गफीट तक कैसे पहुंचा मामला?
जनहित याचिका में दावा किया गया है कि वर्ष 1998 में मोहम्मद मसरुक अली को रामपुर क्षेत्र में आवासीय उपयोग के लिए केवल 600 वर्गफीट भूमि का पट्टा प्रदान किया गया था। लेकिन बाद के वर्षों में कथित रूप से आसपास की नजूल भूमि पर कब्जा बढ़ता गया और देखते ही देखते यह दायरा लगभग 62 हजार वर्गफीट तक पहुंच गया।
याचिकाकर्ता का आरोप है कि कब्जा की गई सरकारी भूमि पर बड़े पैमाने पर व्यावसायिक निर्माण कर शॉपिंग कॉम्पलेक्स विकसित कर दिया गया, जबकि भूमि मूल रूप से सार्वजनिक उपयोग और सरकारी स्वामित्व की थी।
सबसे बड़ा सवाल: प्रशासन की नजरों से कैसे बच गया इतना बड़ा निर्माण?
मामले का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि यदि याचिका में लगाए गए आरोप सही हैं, तो इतने बड़े क्षेत्र में हुए निर्माण पर वर्षों तक प्रशासन की नजर क्यों नहीं पड़ी?
याचिकाकर्ता गणेश धनगढ़ ने अपनी याचिका में आरोप लगाया है कि कथित अतिक्रमण और निर्माण को लेकर कई बार जिला प्रशासन के समक्ष शिकायतें की गईं, लेकिन कोई प्रभावी कार्रवाई नहीं हुई। यही कारण है कि उन्हें अंततः हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाना पड़ा।
जनहित याचिका में उठे गंभीर प्रश्न
याचिका में कई महत्वपूर्ण प्रश्न उठाए गए हैं—
- क्या आवासीय पट्टे की आड़ में सरकारी भूमि पर कब्जा किया गया?
- यदि कब्जा हुआ तो संबंधित राजस्व और प्रशासनिक अधिकारियों ने कार्रवाई क्यों नहीं की?
- क्या निर्माण की अनुमति नियमों के अनुसार दी गई थी?
- क्या सरकारी भूमि का उपयोग व्यावसायिक गतिविधियों के लिए किया गया?
इन सवालों के जवाब अब राज्य सरकार को हाईकोर्ट के समक्ष देने होंगे।
हाईकोर्ट ने मांगा शासन का पक्ष
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता अशोक अग्रवाल ने पक्ष रखा। वहीं राज्य शासन की ओर से अतिरिक्त महाधिवक्ता हरप्रीत रूपराह उपस्थित हुए।
दोनों पक्षों की प्रारंभिक दलीलें सुनने के बाद डिवीजन बेंच ने मामले को गंभीर मानते हुए राज्य सरकार को विस्तृत जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया।
3 अगस्त की सुनवाई पर टिकी निगाहें
अब पूरे मामले की अगली सुनवाई 3 अगस्त को होगी। माना जा रहा है कि उस दिन शासन को रिकॉर्ड के साथ यह स्पष्ट करना होगा कि संबंधित भूमि की वास्तविक स्थिति क्या है और कथित अतिक्रमण के आरोपों पर अब तक क्या कार्रवाई की गई।
यदि आरोप सही पाए जाते हैं तो यह मामला केवल एक अतिक्रमण का नहीं, बल्कि सरकारी भूमि की सुरक्षा और प्रशासनिक जवाबदेही से जुड़ा बड़ा मुद्दा बन सकता है।
