रिश्वतखोरों के दफ्तर में ‘ईमानदारी’ का तमाशा! बाहर शिकायत पेटी, अंदर रिश्वत का खेल

भ्रष्टाचार की शिकायत यहां डालें’… और अंदर चल रहा था रिश्वत का कारोबार

जबलपुर। सरकारी दफ्तरों में पारदर्शिता का संदेश देने के लिए लगाई गई भ्रष्टाचार शिकायत पेटी’ आखिर किसके लिए होती है? शिकायत सुनने के लिए या सिर्फ दिखावे के लिए? यह सवाल मध्यप्रदेश पूर्व क्षेत्र विद्युत वितरण कंपनी के जबलपुर सर्किल कार्यालय में ईओडब्ल्यू की ट्रैप कार्रवाई के बाद और भी बड़ा हो गया है। जिस कार्यालय के बाहर भ्रष्टाचार की शिकायत दर्ज कराने के लिए बाकायदा शिकायत पेटी लगाई गई थी, उसी कार्यालय के दो वरिष्ठ अधिकारी रिश्वत लेते हुए रंगे हाथ पकड़े गए। सबसे चौंकाने वाली बात यह रही कि शिकायत पेटी का ताला इतना जंग खा चुका था कि पहली नजर में ही साफ दिखाई दे रहा था कि उसे वर्षों से खोला ही नहीं गया।यानी बाहर भ्रष्टाचार के खिलाफ संदेश और भीतर रिश्वत का कथित कारोबार—यह विरोधाभास पूरे मामले का सबसे बड़ा प्रतीक बनकर सामने आया है।

जंग लगा ताला बता रहा था पूरी कहानी

कार्यालय के प्रवेश द्वार पर लगी शिकायत पेटी पर साफ लिखा था—भ्रष्टाचार संबंधी शिकायत सीधे इस पेटी में डालें। लेकिन जब ईओडब्ल्यू की कार्रवाई के दौरान लोगों की नजर इस पेटी पर गई तो उसके ताले पर मोटी जंग जमी हुई थी। ऐसा प्रतीत हो रहा था कि वर्षों से न तो पेटी खोली गई और न ही उसमें डाली गई शिकायतों की किसी ने परवाह की। अब सवाल यह उठ रहा है कि यदि शिकायत पेटी केवल औपचारिकता थी तो भ्रष्टाचार रोकने की मंशा कितनी गंभीर थी? और यदि शिकायतें आती भी रही हों तो उनका क्या हुआ?

10 लाख का बिल, रिश्वत की मांग और बिछा ईओडब्ल्यू का जाल

आर्थिक अपराध प्रकोष्ठ (EOW) को गुप्तेश्वर निवासी ठेकेदार अशोक कुमार द्विवेदी ने शिकायत दी थी कि उन्होंने कटनी जिले के बहोरीबंद क्षेत्र में विद्युत विभाग के लिए निर्माण कार्य किया था, जिसका लगभग 10 लाख रुपये का भुगतान लंबित था।शिकायत के अनुसार बिल पास कराने के एवज में कार्यपालन यंत्री (सिविल) चंद्रशेखर मेहरा ने 20 हजार रुपये और अतिरिक्त मुख्य अभियंता (सिविल) प्रहलाद मर्सकोले ने 30 हजार रुपये रिश्वत की मांग की थी।

पहले भी ले चुके थे रकम, दूसरी किस्त में फंस गए
ईओडब्ल्यू ने शिकायत का सत्यापन कराया तो रिश्वत मांगने की पुष्टि हुई। जांच के दौरान यह भी सामने आया कि कार्यपालन यंत्री चंद्रशेखर मेहरा कथित रूप से पहले ही *5 हजार रुपये* रिश्वत के रूप में ले चुका था।इसके बाद ईओडब्ल्यू ने पूरी रणनीति बनाकर ट्रैप बिछाया। सोमवार को जब शिकायतकर्ता दूसरी किस्त देने कार्यालय पहुंचा तो पहले से मौजूद टीम ने कार्रवाई करते हुए दोनों अधिकारियों को रंगे हाथ पकड़ लिया।कार्रवाई के दौरान प्रहलाद मर्सकोले** के पास से 10 हजार रुपये तथा चंद्रशेखर मेहरा के पास से 15 हजार रुपये बरामद किए गए। कुल 25 हजार रुपये की ट्रैप राशि जब्त की गई।

सवाल केवल दो अफसरों का नहीं, पूरे सिस्टम का
इस कार्रवाई ने एक बार फिर सरकारी विभागों की आंतरिक निगरानी व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। यदि कार्यालय के बाहर भ्रष्टाचार रोकने के लिए शिकायत पेटी लगी थी तो फिर शिकायतकर्ता को सीधे ईओडब्ल्यू तक क्यों जाना पड़ा? क्या विभागीय शिकायत तंत्र पूरी तरह निष्क्रिय हो चुका है? क्या शिकायत पेटियां सिर्फ निरीक्षण और फोटो खिंचवाने तक सीमित रह गई हैं?विशेषज्ञों का मानना है कि किसी भी विभाग में शिकायत पेटी तभी प्रभावी होती है, जब उसे नियमित रूप से खोला जाए, शिकायतों का रिकॉर्ड रखा जाए और उन पर कार्रवाई भी हो।

Share This Article
Translate »