22 साल तक फाइलों में दबी रही बहादुरी! 200 फीट खाई में उतरकर बचाई थीं दो जानें, अब हाईकोर्ट ने दिलाया इंसाफ

खाकी के ‘रियल हीरो’ को मिला न्याय, हाईकोर्ट बोला- ऐसे जांबाजों को इंतजार नहीं सम्मान मिलना चाहिए

जबलपुर। एक पुलिस अधिकारी जिसने अपनी जान की परवाह किए बिना 200 फीट गहरी खाई में उतरकर दो लोगों की जिंदगी बचाई, उसे अपनी बहादुरी का इनाम पाने के लिए 22 साल तक अदालतों और सरकारी फाइलों के चक्कर काटने पड़े। आखिरकार मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने इस मामले में ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए न केवल पुलिस विभाग की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े किए हैं, बल्कि यह भी स्पष्ट कर दिया है कि असाधारण साहस दिखाने वाले पुलिसकर्मियों को केवल प्रशस्ति पत्र नहीं, बल्कि उनका वैधानिक अधिकार भी मिलना चाहिए।

जस्टिस विवेक कुमार सिंह की एकलपीठ ने अपने महत्वपूर्ण फैसले में तत्कालीन सब-इंस्पेक्टर इंद्रमणि पटेल को वर्ष 2005 से इंस्पेक्टर पद पर आउट ऑफ टर्न प्रमोशन देने के निर्देश जारी किए हैं। अदालत ने कहा कि ऐसे पुलिसकर्मी खाकी के “रियल हीरो” हैं और उनके मामले को बार-बार समितियों के पास भेजना न्याय का गला घोंटने जैसा होगा।

जब मौत से मुकाबला करने उतर गया एक पुलिस अफसर

यह मामला 22 अप्रैल 2004 का है। इंदौर के समीप भैरूघाट क्षेत्र में ईंटों से भरा एक ट्रक अनियंत्रित होकर करीब 200 फीट गहरी खाई में जा लटका था। ट्रक एक पेड़ के सहारे अटका हुआ था और उसमें फंसे चालक तथा क्लीनर की जान कभी भी जा सकती थी।

मौके पर मौजूद लोगों में दहशत थी। यहां तक कि क्रेन ऑपरेटरों ने भी खाई में उतरने से इनकार कर दिया था। ऐसे समय में सिमरोल थाने में पदस्थ सब-इंस्पेक्टर इंद्रमणि पटेल आगे आए।

बताया जाता है कि उन्होंने केवल एक पतली रस्सी के सहारे खुद को खाई में उतारा। नीचे पहुंचकर चालक और क्लीनर को सुरक्षित बाहर निकाला। इतना ही नहीं, उन्होंने ट्रक को मजबूत रस्सियों से बांधकर स्थिर भी किया, जिससे नीचे सड़क पर गुजर रहे अन्य वाहनों और लोगों की जान भी बच गई।

बहादुरी का सम्मान मिला, लेकिन हक नहीं

इस असाधारण साहसिक कार्य के लिए इंद्रमणि पटेल को गणतंत्र दिवस समारोह में सम्मानित किया गया। मध्यप्रदेश पुलिस रेगुलेशन के नियम 70-ए के तहत उन्हें आउट ऑफ टर्न प्रमोशन देने की सिफारिश भी हुई।

लेकिन यहीं से शुरू हुआ फाइलों का खेल।

सिफारिशों के बावजूद वर्षों तक मामला विभागीय स्तर पर अटका रहा। प्रमोशन की फाइल एक टेबल से दूसरी टेबल तक घूमती रही, लेकिन निर्णय नहीं हुआ। अंततः निराश होकर इंद्रमणि पटेल को वर्ष 2017 में हाईकोर्ट की शरण लेनी पड़ी।

बड़ा सवाल: क्या बहादुरी का भी विभागीय मूल्यांकन होता है?

मामले की सुनवाई के दौरान यह तथ्य सामने आया कि जिस पुलिस अधिकारी ने अपनी जान जोखिम में डालकर दो लोगों को बचाया, उसे विभागीय प्रक्रियाओं और तकनीकी आपत्तियों में उलझाकर रखा गया।

यही कारण था कि हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि ऐसे मामलों को फिर से स्क्रीनिंग कमेटी के पास भेजना न्याय के मूल उद्देश्य के खिलाफ होगा।

अदालत ने स्पष्ट कहा कि याचिकाकर्ता ने अपने कर्तव्य से कहीं बढ़कर कार्य किया था और ऐसे साहसिक कार्यों को प्रशासनिक देरी की भेंट नहीं चढ़ाया जा सकता।

हाईकोर्ट ने दिए ये चार बड़े आदेश

1. 2012 का आदेश निरस्त

पुलिस विभाग द्वारा वर्ष 2012 में जारी उस आदेश को रद्द कर दिया गया, जिसके कारण प्रमोशन का रास्ता बंद हुआ था।

2. 2005 से माना जाएगा इंस्पेक्टर

अदालत ने निर्देश दिया कि इंद्रमणि पटेल को 10 फरवरी 2005 से इंस्पेक्टर पद पर सांकेतिक (नोशनल) पदोन्नति दी जाए।

3. वरिष्ठता और वेतन का लाभ

वर्ष 2005 से उनकी वरिष्ठता, वेतन निर्धारण और वार्षिक वेतनवृद्धि की गणना उसी आधार पर की जाएगी। इससे भविष्य में मिलने वाले पदोन्नति लाभ भी प्रभावित होंगे।

4. 60 दिन में आदेश का पालन

पुलिस मुख्यालय और गृह विभाग को 60 दिनों के भीतर आदेश का पालन सुनिश्चित करने के निर्देश दिए गए हैं।

22 साल बाद मिला इंसाफ, लेकिन उठे कई सवाल

यह फैसला केवल एक पुलिस अधिकारी की जीत नहीं है, बल्कि उन तमाम सरकारी कर्मचारियों के लिए भी संदेश है जो उत्कृष्ट कार्य करने के बावजूद वर्षों तक विभागीय उपेक्षा का शिकार होते हैं।

सबसे बड़ा सवाल यह है कि जिस बहादुरी को विभाग ने स्वयं स्वीकार किया, उसी बहादुरी के आधार पर मिलने वाली पदोन्नति के लिए एक अधिकारी को दो दशक से अधिक समय तक न्यायालय का दरवाजा क्यों खटखटाना पड़ा?

यदि हाईकोर्ट हस्तक्षेप नहीं करता, तो क्या यह मामला भी सरकारी फाइलों में दफन हो जाता?

खाकी के नायकों के लिए नजीर

कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला भविष्य में उन मामलों के लिए मिसाल बनेगा, जहां असाधारण सेवा और वीरता दिखाने वाले पुलिसकर्मियों को विभागीय उदासीनता के कारण उनका वैधानिक अधिकार नहीं मिल पाता।

हाईकोर्ट ने अपने फैसले से यह स्पष्ट कर दिया है कि जनता की जान बचाने के लिए अपनी जान जोखिम में डालने वालों का सम्मान केवल मंचों और समारोहों तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि उन्हें सेवा नियमों के अनुसार वास्तविक लाभ भी मिलना चाहिए।

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