जबलपुर। रानी दुर्गावती विश्वविद्यालय में एक कर्मचारी की कथित आय से अधिक संपत्ति का मामला एक बार फिर सुर्खियों में है। सवाल यह है कि जिस मामले में लोकायुक्त पुलिस ने दो वर्ष पहले जांच शुरू कर दी थी, वह आज तक अंतिम निष्कर्ष तक क्यों नहीं पहुंच सका? क्या जांच की रफ्तार किसी अदृश्य दबाव में थम गई थी, या फिर अब कर्मचारी की सेवानिवृत्ति नजदीक आने पर अचानक सक्रियता दिखाई जा रही है?
विश्वविद्यालय के कर्मचारी बंशबहोर पटेल के खिलाफ आय से अधिक संपत्ति अर्जित करने की शिकायत पर लोकायुक्त पुलिस में प्रकरण क्रमांक ई-315/2024 दर्ज है। शिकायत में आरोप लगाया गया है कि वेतनभोगी कर्मचारी होने के बावजूद उनके पास आय के ज्ञात स्रोतों से कहीं अधिक संपत्ति है। शिकायत के अनुसार, जबलपुर में आलीशान मकान, मऊगंज और जबलपुर में कृषि भूमि, कई वाहन तथा अन्य संपत्तियां जांच के दायरे में हैं। इन आरोपों की पुष्टि या खंडन जांच पूरी होने के बाद ही हो सकेगा।
दो साल तक फाइलें चलती रहीं, नतीजा नहीं आया
सबसे बड़ा सवाल जांच की गति को लेकर उठ रहा है। शिकायतकर्ता पक्ष का कहना है कि मामला दर्ज होने के बाद भी दो वर्षों तक जांच किसी ठोस परिणाम तक नहीं पहुंची। अब जबकि संबंधित कर्मचारी आगामी 30 सितंबर को सेवानिवृत्त होने वाले हैं, लोकायुक्त पुलिस की सक्रियता अचानक बढ़ गई है। इससे यह चर्चा भी तेज हो गई है कि आखिर अब तक जांच लंबित क्यों रही?
क्या गलत जानकारी भेजी गई थी?
सूत्रों के अनुसार, लोकायुक्त पुलिस ने विश्वविद्यालय प्रशासन से संबंधित कर्मचारी की पूरी सेवा अवधि में प्राप्त वेतन, पदोन्नति, भत्तों और अन्य वित्तीय जानकारियों का रिकॉर्ड मांगा था। आरोप है कि प्रारंभिक स्तर पर उपलब्ध कराई गई जानकारी अधूरी या निर्धारित प्रारूप के अनुरूप नहीं थी। यदि ऐसा है, तो यह भी जांच का विषय बन सकता है कि सही जानकारी उपलब्ध कराने में देरी क्यों हुई और उसकी जिम्मेदारी किसकी है।
लोकायुक्त ने विश्वविद्यालय में डाला डेरा
सूत्र बताते हैं कि पिछले दो दिनों से लोकायुक्त पुलिस की टीम विश्वविद्यालय में मौजूद है। टीम लगभग 40 वर्षों के सेवा रिकॉर्ड, वेतन विवरण, भुगतान रजिस्टर और अन्य दस्तावेजों का मिलान कर रही है। माना जा रहा है कि वास्तविक आय और अर्जित संपत्ति के बीच अंतर का आकलन करने के लिए दस्तावेजों की गहन जांच की जा रही है।
रिटायरमेंट से पहले बढ़ी बेचैनी
शिकायतकर्ता अधिवक्ता ज्ञानेन्द्र तिवारी ने पुलिस अधीक्षक, लोकायुक्त को ज्ञापन सौंपकर मांग की है कि सेवानिवृत्ति से पहले जांच पूरी कर वैधानिक कार्रवाई की जाए। उनका कहना है कि यदि जांच लंबित रहते हुए सेवानिवृत्ति संबंधी लाभों का भुगतान हो जाता है, तो आगे की प्रक्रिया जटिल हो सकती है। उन्होंने यह भी कहा है कि यदि समयबद्ध कार्रवाई नहीं हुई तो न्यायालय का दरवाजा खटखटाया जाएगा।
अब तीन बड़े सवाल
पहला सवाल: दो वर्ष तक जांच अंतिम निष्कर्ष तक क्यों नहीं पहुंची?
दूसरा सवाल: यदि विश्वविद्यालय से गलत या अधूरी जानकारी भेजी गई थी, तो उसके लिए जिम्मेदार कौन है?
तीसरा सवाल: क्या कर्मचारी की सेवानिवृत्ति से पहले लोकायुक्त जांच पूरी कर पाएगी या यह मामला भी लंबित फाइलों की सूची में शामिल हो जाएगा?
लोकायुक्त की टीम फिलहाल दस्तावेजों की जांच कर रही है। यदि जांच में आय और संपत्ति के बीच असामान्य अंतर या अन्य अनियमितताएं सामने आती हैं, तो संबंधित कानूनों के तहत आगे की कार्रवाई की जा सकती है। वहीं यदि आरोप प्रमाणित नहीं होते हैं, तो जांच उसी अनुरूप समाप्त की जाएगी। फिलहाल पूरे मामले पर विश्वविद्यालय और लोकायुक्त की अगली कार्रवाई पर सभी की नजरें टिकी हैं।
