जबलपुर। क्या जबलपुर में निजी अस्पताल इतने ताकतवर हो चुके हैं कि जिला स्वास्थ्य विभाग के नोटिस भी उनके लिए महज कागज का टुकड़ा बनकर रह गए हैं? क्या एक मरीज को अपने ही इलाज की फाइल हासिल करने के लिए महीनों तक सरकारी दफ्तरों के चक्कर काटने पड़ेंगे? और सबसे बड़ा सवाल—जब मरीज का पैर कट जाए, तब भी क्या स्वास्थ्य तंत्र की संवेदनाएं नहीं जागतीं?
ये सवाल इसलिए उठ रहे हैं क्योंकि पिछले छह महीनों से दो महिलाएं, जो कथित रूप से एक निजी अस्पताल की लापरवाही के बाद अपने पैर गंवा चुकी हैं, अपने ही इलाज से जुड़े दस्तावेज पाने के लिए संघर्ष कर रही हैं। लेकिन उन्हें अब तक मेडिकल रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं कराया गया है।
नोटिस जारी, लेकिन असर शून्य
सूत्रों के अनुसार मामले की शिकायत जिला स्वास्थ्य विभाग तक पहुंची। इसके बाद संबंधित अस्पतालों को नोटिस भी जारी किए गए। लेकिन हैरानी की बात यह है कि नोटिस के बावजूद रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं कराया गया। इससे बड़ा सवाल यह खड़ा होता है कि यदि स्वास्थ्य विभाग के आदेशों का पालन नहीं हो रहा, तो कार्रवाई क्यों नहीं हो रही?
सामने आया सीएमएचओ का कथित ऑडियो
मामले ने तब नया मोड़ ले लिया जब पीड़ितों की ओर से पैरवी कर रहे अधिवक्ता दीपांशु साहू और सीएमएचओ डॉ. नवीन कोठारी के बीच हुई बातचीत का एक कथित ऑडियो सामने आया। ऑडियो में सीएमएचओ यह कहते सुनाई दे रहे हैं कि अस्पतालों को नोटिस दिए गए हैं, लेकिन वे रिकॉर्ड नहीं दे रहे। साथ ही शिकायतकर्ताओं को सीएम हेल्पलाइन में शिकायत करने की सलाह भी दी जा रही है।
यहीं से सवालों का सिलसिला शुरू हो जाता है। यदि जिला स्वास्थ्य अधिकारी के नोटिस का पालन नहीं हो रहा, तो क्या विभाग के पास कार्रवाई के अन्य अधिकार नहीं हैं? और यदि हैं, तो उनका उपयोग क्यों नहीं किया गया?
पीड़ितों का दर्द: पैर भी गया, फाइल भी नहीं मिली
इन दोनों महिलाओं की कहानी सिर्फ मेडिकल रिकॉर्ड तक सीमित नहीं है। वे पहले ही अपना एक-एक पैर गंवा चुकी हैं। अब वे यह जानना चाहती हैं कि आखिर उनके इलाज के दौरान क्या हुआ था। लेकिन जिस फाइल में उनके इलाज का पूरा इतिहास दर्ज है, वही उन्हें नहीं मिल रही।
कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि मरीज या उसके परिजनों को इलाज संबंधी रिकॉर्ड उपलब्ध कराना अस्पताल की जिम्मेदारी है। ऐसे दस्तावेज किसी भी संभावित जांच, मुआवजा दावे या न्यायिक प्रक्रिया के लिए बेहद महत्वपूर्ण होते हैं।
अधिवक्ता ने उठाए तीखे सवाल
मामले को लेकर अधिवक्ता दीपांशु साहू ने स्वास्थ्य विभाग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाते हुए कहा कि यदि एक निजी अस्पताल जिला स्वास्थ्य अधिकारी के नोटिस को भी नजरअंदाज कर दे और फिर भी उसके खिलाफ कोई प्रभावी कार्रवाई न हो, तो यह प्रशासनिक कमजोरी का संकेत है।
उन्होंने पूछा कि क्या जबलपुर के स्वास्थ्य इतिहास में कभी ऐसा दौर आया है जब मरीजों को उनके ही इलाज की फाइल दिलाने में स्वास्थ्य विभाग असहाय नजर आया हो?
बड़ा सवाल: आखिर अस्पतालों को संरक्षण किसका?
इस पूरे मामले में सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यही है कि आखिर छह महीने बीत जाने के बाद भी रिकॉर्ड क्यों नहीं मिला? क्या अस्पतालों पर किसी प्रकार का दबाव नहीं बनाया गया? क्या स्वास्थ्य विभाग के पास कार्रवाई की शक्ति नहीं है, या फिर उसका इस्तेमाल नहीं किया जा रहा?
जब तक इन सवालों के जवाब नहीं मिलते, तब तक दो महिलाओं का दर्द सिर्फ व्यक्तिगत त्रासदी नहीं, बल्कि पूरे स्वास्थ्य तंत्र की जवाबदेही पर खड़ा एक बड़ा सवाल बना रहेगा।
