टॉपर बनीं, नौकरी के करीब पहुंचीं… फिर खुली फर्जी मार्कशीट की परतें, हाईकोर्ट ने सुनाया करारा फैसला, फर्जी मार्कशीट का खेल बेनकाबः मेरिट में टॉपर, जांच में निकलीं फर्जी; हाईकोर्ट बोला- कोर्ट का समय बर्बाद मत करो

जबलपुर। सरकारी नौकरी की दौड़ में दो नाम अचानक सबसे आगे निकल आए थे। मेरिट सूची आई तो दोनों महिलाएं शीर्ष स्थानों पर थीं। चयन लगभग तय माना जा रहा था। लेकिन पर्दे के पीछे कुछ ऐसा चल रहा था, जिसकी भनक लगते ही पूरी भर्ती प्रक्रिया सवालों के घेरे में आ गई। एक शिकायत हुई, दस्तावेजों की पड़ताल शुरू हुई और फिर जो सच सामने आया, उसने न सिर्फ भर्ती व्यवस्था को झकझोर दिया बल्कि मामला हाईकोर्ट तक पहुंच गया।यह मामला है टीकमगढ़ जिले की आंगनबाड़ी कार्यकर्ता भर्ती का, जहां नौकरी की सीढ़ी चढ़ने के लिए कथित तौर पर फर्जी शैक्षणिक दस्तावेजों का सहारा लेने का मामला सामने आया।

साल 2025 में महिला एवं बाल विकास विभाग ने आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं की भर्ती निकाली थी। ममता यादव और नीतू राजपूत ने भी आवेदन किया। आवेदन के साथ भोपाल स्थित महर्षि पतंजलि संस्कृत संस्थान की 12वीं की अंकसूचियां प्रस्तुत की गईं। प्रारंभिक जांच में दस्तावेज सही मान लिए गए और अगस्त 2025 में जारी अंतरिम मेरिट सूची में दोनों आवेदिकाएं शीर्ष स्थानों पर पहुंच गईं।

 

मामले ने यहां से करवट ली

भर्ती प्रक्रिया के दौरान जिला चयन समिति के पास शिकायत पहुंची कि दोनों महिलाओं द्वारा प्रस्तुत की गई मार्कशीट संदिग्ध हैं। शिकायत को नजरअंदाज नहीं किया गया। मामला जिला स्तरीय विवाद निवारण समिति तक पहुंचा और संबंधित संस्थान से दस्तावेजों का सत्यापन कराया गया।जांच रिपोर्ट आने में कुछ समय लगा, लेकिन जब जनवरी 2026 में रिपोर्ट सामने आई तो भर्ती प्रक्रिया में भूचाल आ गया। संस्थान ने स्पष्ट कर दिया कि दोनों अंकसूचियां वास्तविक नहीं हैं और पूरी तरह फर्जी एवं कूटरचित हैं। रिपोर्ट मिलते ही जिला कार्यक्रम अधिकारी ने कार्रवाई करते हुए दोनों महिलाओं को भर्ती प्रक्रिया से अयोग्य घोषित कर दिया। इतना ही नहीं, उनके खिलाफ पुलिस में एफआईआर दर्ज कराने के निर्देश भी जारी कर दिए गए। मामला यहीं नहीं रुका। दोनों महिलाओं ने विभागीय कार्रवाई को हाईकोर्ट में चुनौती दे दी। उनका तर्क था कि उन्हें पर्याप्त अवसर नहीं दिया गया और विभाग की कार्रवाई गलत है। 

हाईकोर्ट ने सख्त रूख अपनाया

लेकिन हाईकोर्ट ने रिकॉर्ड और जांच रिपोर्ट का परीक्षण करने के बाद बेहद सख्त रुख अपनाया। जस्टिस विशाल मिश्रा की अवकाशकालीन पीठ ने साफ कहा कि जब भर्ती का आधार बने दस्तावेज ही फर्जी पाए गए हैं तो अतिरिक्त सुनवाई का कोई औचित्य नहीं बचता। अदालत ने यह भी टिप्पणी की कि ऐसे मामलों में और समय देना न्यायालय के बहुमूल्य समय की बर्बादी होगी।

अदालत ने दोनों याचिकाएं खारिज कर दीं और विभागीय कार्रवाई को सही ठहराया। हालांकि कोर्ट ने यह छूट जरूर दी कि यदि पुलिस आपराधिक कार्रवाई करती है तो याचिकाकर्ता कानून के तहत उपलब्ध वैधानिक उपाय अपना सकती हैं। इस फैसले को भर्ती प्रक्रियाओं में फर्जी दस्तावेजों के खिलाफ एक बड़ा संदेश माना जा रहा है। अदालत ने स्पष्ट कर दिया है कि सरकारी नौकरी पाने के लिए फर्जी प्रमाणपत्रों का सहारा लेने वालों के लिए न्यायालय में राहत की राह आसान नहीं होगी।

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