एक डॉक्टर… तीन जिले… तीन नौकरियां! मध्यप्रदेश का सबसे बड़ा ‘फर्जी डॉक्टर’ खेल बेनकाब

EXPOSE: एक नाम… तीन जिले… तीन सरकारी नौकरियां! ‘डॉ. महेश चंद शर्मा’ बनकर करोड़ों के सिस्टम को कैसे दिया गया चकमा?

लोकायुक्त की रिश्वत कार्रवाई से खुला फर्जीवाड़े का जाल, अब असली डॉक्टर सामने आए। चाचा पर पहचान चुराकर सरकारी नौकरी करने का आरोप; भर्ती और दस्तावेज सत्यापन व्यवस्था पर बड़े सवाल।


भोपाल/शहडोल।

मध्यप्रदेश की स्वास्थ्य व्यवस्था में ऐसा कथित फर्जीवाड़ा सामने आया है, जिसने सरकारी भर्ती प्रक्रिया, दस्तावेज सत्यापन और निगरानी तंत्र पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। मामला केवल रिश्वतखोरी का नहीं, बल्कि एक ही नाम से तीन अलग-अलग जिलों में सरकारी डॉक्टर की नौकरी किए जाने के आरोपों का है। इस पूरे घटनाक्रम का खुलासा तब हुआ, जब 3 जुलाई को रीवा लोकायुक्त ने शहडोल जिले में पदस्थ एक संविदा चिकित्सक को कथित रिश्वत लेते हुए गिरफ्तार किया।

लोकायुक्त की कार्रवाई के बाद शुरू हुई दस्तावेजों की जांच ने ऐसा खुलासा किया कि जांच एजेंसियां भी चौंक गईं। जांच में सामने आया कि ‘डॉ. महेश चंद शर्मा’ नाम से केवल शहडोल ही नहीं, बल्कि श्योपुर और खरगोन जिले में भी नियुक्तियां दर्ज हैं। इसके बाद मामला साधारण भ्रष्टाचार से निकलकर कथित पहचान चोरी, फर्जी दस्तावेज और सरकारी तंत्र में बड़ी सेंध तक पहुंच गया।


लोकायुक्त की कार्रवाई बनी पूरे खेल का टर्निंग प्वाइंट

3 जुलाई को रीवा लोकायुक्त की टीम ने शहडोल जिले के ऊफरी प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र में पदस्थ एक संविदा चिकित्सक को कथित रिश्वत लेते हुए पकड़ा। उस समय यह मामला सामान्य भ्रष्टाचार का प्रतीत हो रहा था, लेकिन दस्तावेजों की जांच में कहानी पूरी तरह बदल गई।

राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन (एनएचएम) ने जब नियुक्ति संबंधी रिकॉर्ड खंगाले तो पाया कि इसी नाम का चिकित्सक श्योपुर जिले में जून 2021 से और खरगोन जिले के केली स्वास्थ्य केंद्र में फरवरी 2023 से भी पदस्थ दर्शाया गया है।


एक नाम… लेकिन अलग-अलग दस्तावेज!

जांच में कथित तौर पर यह भी सामने आया कि नियुक्तियों के दौरान पिता के नाम में मामूली बदलाव, अलग-अलग दस्तावेज और तीन अलग-अलग पैन कार्ड का इस्तेमाल किया गया। आरोप है कि इन्हीं दस्तावेजों के आधार पर संविदा नियुक्तियां हासिल की गईं।

यदि जांच में यह तथ्य सही साबित होते हैं, तो यह केवल एक व्यक्ति का फर्जीवाड़ा नहीं, बल्कि दस्तावेज सत्यापन व्यवस्था की बड़ी विफलता भी माना जाएगा।


जब सामने आया ‘असली’ डॉ. महेश चंद शर्मा

मामले में सबसे बड़ा मोड़ तब आया जब एक एमबीबीएस चिकित्सक खुद पुलिस के पास पहुंचे और दावा किया कि वही असली डॉ. महेश चंद शर्मा हैं।

उन्होंने शहडोल के जयसिंहनगर थाने में शिकायत दर्ज कराते हुए कहा कि उनकी शैक्षणिक पहचान और दस्तावेजों का दुरुपयोग कर कोई अन्य व्यक्ति सरकारी नौकरी कर रहा था। शिकायतकर्ता ने स्पष्ट किया कि उनका कथित नियुक्तियों से कोई संबंध नहीं है।


चाचा पर पहचान चुराने का आरोप

शिकायतकर्ता डॉक्टर ने अपने चाचा सतीश शर्मा पर गंभीर आरोप लगाए हैं। शिकायत के अनुसार उनके चाचा ने कथित रूप से एमबीबीएस से जुड़े दस्तावेजों का उपयोग कर तीन जिलों में नौकरी हासिल की और वर्षों तक सरकारी मानदेय प्राप्त किया।

हालांकि, यह आरोप फिलहाल जांच के दायरे में हैं और पुलिस द्वारा इनकी पुष्टि की जानी बाकी है। आरोपित पक्ष की ओर से अभी तक कोई सार्वजनिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।


राजस्थान में नौकरी कर रहे हैं शिकायतकर्ता

शिकायतकर्ता ने पुलिस को बताया कि उन्होंने वर्ष 2019 में भोपाल के पीपुल्स मेडिकल कॉलेज से एमबीबीएस की पढ़ाई पूरी की थी। वर्तमान में वे राजस्थान के डीग जिले के पूंछरी सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में चिकित्सक के रूप में कार्यरत हैं।

यानी एक ओर असली डॉक्टर दूसरे राज्य में सेवाएं दे रहे थे, जबकि दूसरी ओर उनके नाम से मध्यप्रदेश के अलग-अलग जिलों में कथित नियुक्तियां चलती रहीं।


एफआईआर दर्ज, जांच कई एजेंसियों के पास

राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन की शिकायत पर भोपाल के चुनाभट्टी थाने में धोखाधड़ी सहित विभिन्न धाराओं में एफआईआर दर्ज की गई है। वहीं शहडोल के जयसिंहनगर थाने में भी शिकायत दर्ज कर जांच शुरू कर दी गई है।

पुलिस अब एमबीबीएस डिग्री, नियुक्ति रिकॉर्ड, पैन कार्ड, पहचान पत्र और अन्य दस्तावेजों का सत्यापन कर रही है। तीसरे जिले खरगोन का रिकॉर्ड भी जांच एजेंसियों के पास पहुंचने की प्रक्रिया में है।


सबसे बड़े सवाल

  • यदि एक ही नाम से तीन जिलों में नियुक्तियां थीं, तो दस्तावेज सत्यापन के दौरान यह पकड़ में क्यों नहीं आया?
  • क्या केवल नाम बदलकर या पिता के नाम में संशोधन कर सरकारी भर्ती संभव हो गई?
  • वर्षों तक वेतन का भुगतान किस आधार पर होता रहा?
  • नियुक्ति प्रक्रिया में जिम्मेदार अधिकारियों की भूमिका की भी जांच होगी?
  • यदि पहचान का दुरुपयोग हुआ, तो इसकी जिम्मेदारी किसकी तय होगी?

जांच से तय होगी सच्चाई

फिलहाल पूरा मामला पुलिस और राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन की जांच के अधीन है। शिकायतकर्ता द्वारा लगाए गए आरोपों और जांच एजेंसियों के प्रारंभिक निष्कर्षों की अभी विधिक पुष्टि होना बाकी है। जांच पूरी होने के बाद ही यह स्पष्ट होगा कि कथित फर्जी नियुक्तियों के पीछे कौन-कौन जिम्मेदार थे और क्या इसमें किसी बड़े नेटवर्क की भूमिका भी थी।

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