कोर्ट से बरी, फिर भी नौकरी नहीं! हाईकोर्ट ने पुलिस आरक्षक की बर्खास्तगी रखी बरकरार”

आपराधिक केस में बरी होने के बाद भी नहीं मिली नौकरी, हाईकोर्ट ने पुलिस आरक्षक की बर्खास्तगी बरकरार रखी

कहा- विभागीय कार्रवाई और आपराधिक मुकदमे अलग-अलग, अनुशासित बल के सदस्य से उच्च आचरण की अपेक्षा

जबलपुर। मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि किसी सरकारी कर्मचारी के आपराधिक मामले में बरी हो जाने मात्र से उसके खिलाफ की गई विभागीय कार्रवाई स्वतः समाप्त नहीं हो जाती। अदालत ने रीवा पुलिस लाइन के बर्खास्त आरक्षक की याचिका खारिज करते हुए कहा कि अनुशासित बल के सदस्य से उच्च स्तर के आचरण की अपेक्षा की जाती है और विभागीय जांच का दायरा आपराधिक मुकदमे से अलग होता है।

जस्टिस दीपक खोत की एकलपीठ ने अपने आदेश में कहा कि याचिकाकर्ता पुलिस बल का सदस्य था और ड्यूटी के दौरान गंभीर कदाचार का आरोपी रहा। ऐसे में केवल आपराधिक न्यायालय से दोषमुक्त हो जाने के आधार पर विभागीय कार्रवाई को निरस्त नहीं किया जा सकता।

क्या था मामला?

याचिकाकर्ता रामपाल अहिरवार रीवा पुलिस लाइन में आरक्षक के पद पर पदस्थ था। उसके खिलाफ आरोप था कि 10 जुलाई 2019 को एक ऑटो में सफर कर रही महिला से स्कार्फ हटाने को कहा गया। महिला द्वारा विरोध करने पर कथित रूप से चाकू दिखाकर उसे धमकाया गया। इस घटना के बाद सिविल लाइंस थाना में उसके खिलाफ संबंधित धाराओं एवं आर्म्स एक्ट के तहत अपराध दर्ज किया गया।

आपराधिक मामला दर्ज होने के बाद पुलिस विभाग ने विभागीय जांच शुरू की। जांच में गंभीर कदाचार पाए जाने पर 8 अगस्त 2020 को उसे सेवा से बर्खास्त कर दिया गया।

बरी होने के बाद मांगी थी बहाली

बाद में आपराधिक न्यायालय से दोषमुक्त होने के बाद रामपाल अहिरवार ने विभागीय बर्खास्तगी का आदेश वापस लेने की मांग करते हुए अपील की। विभाग ने अपील खारिज कर दी, जिसके बाद उसने हाईकोर्ट में याचिका दायर की।

याचिका में तर्क दिया गया कि जिस घटना के आधार पर विभागीय कार्रवाई हुई थी, उसी मामले में अदालत ने उसे दोषमुक्त कर दिया है। इसलिए बर्खास्तगी का आदेश भी समाप्त किया जाना चाहिए।

सरकार का पक्ष

राज्य सरकार की ओर से दलील दी गई कि आपराधिक न्यायालय ने आरोपी को संदेह का लाभ देते हुए बरी किया है। वहीं विभागीय जांच में साक्ष्यों के आधार पर कदाचार सिद्ध पाया गया। दोनों प्रक्रियाओं के उद्देश्य और प्रमाण का स्तर अलग-अलग होता है, इसलिए विभागीय कार्रवाई पूरी तरह वैध है।

हाईकोर्ट ने क्या कहा?

हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि आपराधिक मुकदमे और विभागीय जांच की प्रकृति अलग होती है। आपराधिक मामले में अपराध संदेह से परे सिद्ध करना आवश्यक होता है, जबकि विभागीय जांच में उपलब्ध साक्ष्यों और संभावनाओं के आधार पर भी निर्णय लिया जा सकता है।

अदालत ने यह भी उल्लेख किया कि विभागीय जांच के दौरान शिकायतकर्ता महिला ने स्पष्ट रूप से आरक्षक की भूमिका बताई थी। बाद में आपराधिक मुकदमे के दौरान महिला अपने बयान से मुकर गई और आरोपी की पहचान से इनकार कर दिया। केवल इस आधार पर विभागीय कार्रवाई को गलत नहीं ठहराया जा सकता।

महत्वपूर्ण टिप्पणी

एकलपीठ ने कहा कि पुलिस जैसे अनुशासित बल के सदस्य से निष्कलंक आचरण की अपेक्षा की जाती है। यदि विभागीय जांच में कदाचार सिद्ध होता है तो केवल आपराधिक मुकदमे में बरी होने के आधार पर सेवा में बहाली का अधिकार स्वतः उत्पन्न नहीं हो जाता।इन्हीं टिप्पणियों के साथ हाईकोर्ट ने बर्खास्त पुलिस आरक्षक की याचिका खारिज कर विभागीय बर्खास्तगी के आदेश को बरकरार रखा।

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