जबलपुर में ‘सरकारी’ रेत ठप, ‘अवैध’ चकाचक! 9 महीने में 4 बार टेंडर फेल आखिर किसकी शह पर बह रही है ‘काली रेत’?

करोड़ों के राजस्व का नुकसान: राज्य पर्यावरण प्राधिकरण की सख्ती से 42 से घटकर 31 रह गईं खदानें
घाटे के डर से ठेकेदारों ने खींचे हाथ!
जबलपुर।
जबलपुर जिले में पिछले नौ महीनों से रेत खदानों का कानूनी और वैध संचालन पूरी तरह ठप पड़ा है, लेकिन हैरानी की बात यह है कि बाजार में रेत की किल्लत कहीं नजर नहीं आ रही। शहर से लेकर देहात तक अवैध उत्खनन और परिवहन का ‘काला खेल’ धड़ल्ले से जारी है। बड़ा सवाल यह है कि जब कागजों पर वैध खनन बंद है, तो रोजाना सैकड़ों डंपर रेत किसकी सरपरस्ती और किसके ‘मंथली कलेक्शन’ के दम पर थानों और नाकों के सामने से गुजर रही है?

अक्टूबर 2025 से अब तक 4 टेंडर फेल, कोई ठेकेदार तैयार नहीं!
सूत्रों के मुताबिक, जिला प्रशासन और खनिज निगम अक्टूबर 2025 से लेकर अब तक चार बार निविदाएं (टेंडर) जारी कर चुका है, लेकिन हर बार नतीजा ढाक के तीन पात रहा। कोई भी बड़ा ठेकेदार जबलपुर की रेत खदानों को हाथ लगाने को तैयार नहीं है। इस सुस्ती ने खनिज विभाग के दावों और प्रशासनिक रणनीति की पोल खोलकर रख दी है।

क्यों ‘घाटे का सौदा’ बन गईं जबलपुर की खदानें?
बाजार के जानकारों और रेतीले कारोबार से जुड़े सूत्रों का कहना है कि वर्तमान टेंडर नीति व्यावहारिक नहीं है, जिसके कारण कारोबारी इसे आर्थिक रूप से फायदेमंद नहीं मान रहे हैं। इसके पीछे मुख्य कारण हैं:

खदानों की संख्या घटी: पहले जिले की 42 खदानों से एक साथ संचालन होता था। लेकिन राज्य स्तरीय पर्यावरण प्रभाव आकलन प्राधिकरण (SEIAA) द्वारा 11 खदानों की पर्यावरणीय अनुमति (EC) निरस्त किए जाने के बाद अब केवल 31 खदानें ही बची हैं।रेत की मात्रा में भारी कटौती: पहले जिले में 5 लाख घनमीटर से अधिक रेत निकालने की अनुमति थी, जो अब घटकर महज 3.89 लाख घनमीटर रह गई है। खदानें कम और रेत का कोटा कम होने से ठेकेदारों को मुनाफा नहीं दिख रहा।

करोड़ों का चूना: शर्मा एसोसिएट्स के सरेंडर के बाद डूबा राजस्व
इससे पहले खनिज निगम ने ‘शर्मा एसोसिएट्स’ को 16 करोड़ 77 लाख 85 हजार रुपये में एक साल का ठेका दिया था, जिसके तहत 5 लाख घनमीटर रेत निकालने का प्रावधान था। लेकिन नियमों के फेर और घाटे को देखते हुए ठेकेदार ने अवधि पूरी होने से पहले ही अक्टूबर 2025 में ठेका सरेंडर (वापस) कर दिया था। तब से लेकर आज तक सरकार को करोड़ों रुपये के राजस्व का सीधा नुकसान हो चुका है।

समूह बदले, पैंतरे बदले… लेकिन नहीं बदला नतीजा!

प्रशासन ने ठेकेदारों को लुभाने के लिए कई तरह के फॉर्मूले अपनाए, लेकिन सब फेल रहे:पहला दांव: पहले पूरे जिले की खदानों का एक ही ग्रुप (समूह) बनाकर टेंडर निकाला गया। कोई नहीं आया।दूसरा दांव: प्रक्रिया आसान करने के लिए खदानों को 5 समूहों—जबलपुर, शाहपुरा-ए, शाहपुरा-बी, पाटन और सिहोरा-मझौली में बांटा गया। फिर भी किसी ने दिलचस्पी नहीं दिखाई।अब फिर पुराना ढर्रा: थक-हारकर प्रशासन ने एक बार फिर सभी खदानों को एक ही समूह में शामिल कर टेंडर जारी किया है, लेकिन स्थिति आज भी ‘जस की तस’ बनी हुई है।

वैध बंद तो अवैध क्यों नहीं रुक रहा?
जब 9 महीने से किसी ठेकेदार के पास वैध कमान नहीं है, तो नर्मदा और उसकी सहायक नदियों का सीना कौन चीर रहा है?
टेंडर बार-बार फेल होने के बावजूद क्या खनिज विभाग के कुछ भ्रष्ट अधिकारियों की सांठगांठ से ही यह ‘सिंडिकेट’ फल-फूल रहा है, ताकि बिना रॉयल्टी चुकाए करोड़ों की रेत खपाई जा सके?सरकार के खजाने को लग रहे इस 16 करोड़ से अधिक के फटके (राजस्व नुकसान) की जवाबदेही आखिर किसकी है?

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