15 साल की दुष्कर्म पीड़िता का गर्भपात भी खतरे में! हाईकोर्ट ने क्यों गठित कराया 5 डॉक्टरों का विशेष बोर्ड?
मंडला से हाईकोर्ट तक पहुंचा मामला, मेडिकल रिपोर्ट ने बढ़ाई चिंता; गर्भ जारी रहे या समाप्त हो, दोनों में खतरे की आशंका
जबलपुर। मध्यप्रदेश हाईकोर्ट के समक्ष पहुंचे एक संवेदनशील मामले ने बाल सुरक्षा, स्वास्थ्य व्यवस्था और न्यायिक प्रक्रिया को लेकर कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। मंडला जिले की एक 15 वर्षीय दुष्कर्म पीड़िता, जो 10 सप्ताह से अधिक की गर्भवती है, अब ऐसे मोड़ पर खड़ी है जहां गर्भ जारी रखना भी जोखिम भरा माना जा रहा है और गर्भपात कराना भी।
इसी गंभीर स्थिति को देखते हुए मध्यप्रदेश हाईकोर्ट की वेकेशन बेंच ने नेताजी सुभाष चंद्र बोस मेडिकल कॉलेज, जबलपुर में पांच विशेषज्ञ चिकित्सकों का विशेष मेडिकल बोर्ड गठित करने के निर्देश दिए हैं। अब इस बोर्ड की रिपोर्ट के आधार पर तय होगा कि नाबालिग पीड़िता का गर्भपात कराया जाए या नहीं।
मेडिकल रिपोर्ट ने बढ़ाई अदालत की चिंता
मामला तब गंभीर हो गया जब जिला अस्पताल मंडला के मेडिकल बोर्ड ने अपनी रिपोर्ट में गर्भपात की अनुशंसा तो की, लेकिन साथ ही यह भी उल्लेख किया कि पीड़िता की कम उम्र और शारीरिक स्थिति को देखते हुए गर्भसमापन की प्रक्रिया उसके जीवन के लिए गंभीर जोखिम पैदा कर सकती है।
यहीं से यह मामला सामान्य चिकित्सा निर्णय से निकलकर कानूनी और मानवीय संवेदनाओं का विषय बन गया। विशेष पॉक्सो न्यायालय मंडला ने स्वयं अंतिम निर्णय लेने के बजाय पूरा मामला हाईकोर्ट को संदर्भित कर दिया।
अदालत के सामने सबसे बड़ा सवाल: बचाई जाए मां या रोका जाए जोखिम?
हाईकोर्ट के समक्ष प्रस्तुत दस्तावेजों के अनुसार पीड़िता लगभग 10 सप्ताह और 5 दिन की गर्भवती है। कानून नाबालिग दुष्कर्म पीड़िताओं के मामलों में गर्भसमापन की अनुमति देता है, लेकिन जब गर्भपात स्वयं जीवन के लिए खतरा बन जाए, तब स्थिति जटिल हो जाती है।
इसी कारण जस्टिस विनय सराफ की बेंच ने विशेषज्ञों की राय को आवश्यक माना और पांच सदस्यीय मेडिकल बोर्ड गठित करने का आदेश दिया।
तीन सवाल जिन पर टिकी है पीड़िता की जिंदगी
हाईकोर्ट ने मेडिकल बोर्ड से तीन महत्वपूर्ण प्रश्नों पर स्पष्ट और वैज्ञानिक राय मांगी है—
क्या गर्भ जारी रहने से जान को खतरा है?
अदालत जानना चाहती है कि यदि गर्भावस्था जारी रहती है तो क्या इससे पीड़िता के जीवन, शारीरिक स्वास्थ्य या मानसिक स्थिति पर गंभीर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।
क्या गर्भपात ज्यादा जोखिम भरा है?
दूसरा महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी (एमटीपी) की प्रक्रिया स्वयं पीड़िता के जीवन के लिए असामान्य या गंभीर खतरा तो उत्पन्न नहीं करेगी।
बच्चे में विकृति की आशंका कितनी?
यदि गर्भावस्था जारी रहती है और बच्चे का जन्म होता है तो क्या उसमें किसी गंभीर शारीरिक अथवा मानसिक विकृति की संभावना है? अदालत ने इस पहलू पर भी विशेषज्ञ राय मांगी है।
मेडिकल कॉलेज जबलपुर पर टिकी निगाहें
अब पूरे मामले की नजरें नेताजी सुभाष चंद्र बोस मेडिकल कॉलेज के विशेषज्ञ बोर्ड पर टिकी हैं। बोर्ड की रिपोर्ट न केवल इस पीड़िता के भविष्य का फैसला करेगी बल्कि यह भी तय करेगी कि न्याय और चिकित्सा विज्ञान के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए।
विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसे मामलों में केवल कानूनी प्रावधान पर्याप्त नहीं होते, बल्कि पीड़िता की उम्र, मानसिक स्थिति, शारीरिक क्षमता और भविष्य के प्रभावों का समग्र मूल्यांकन आवश्यक होता है।
15 जून की सुनवाई बनेगी निर्णायक
हाईकोर्ट ने मेडिकल बोर्ड को जल्द रिपोर्ट प्रस्तुत करने के निर्देश दिए हैं। मामले की अगली सुनवाई 15 जून को होगी। माना जा रहा है कि उसी दिन अदालत मेडिकल रिपोर्ट के आधार पर यह महत्वपूर्ण निर्णय ले सकती है कि पीड़िता का गर्भपात कराया जाए या गर्भावस्था को जारी रखा जाए।
फिलहाल यह मामला केवल एक कानूनी विवाद नहीं, बल्कि एक नाबालिग पीड़िता के जीवन, स्वास्थ्य और भविष्य से जुड़ा बेहद संवेदनशील प्रश्न बन चुका है।
