जेल नहीं, अस्पताल में कट रही सजा? सुपर स्पेशलिटी में बंदियों की ‘लंबी मेहमाननवाजी’

जबलपुर। नेताजी सुभाषचंद्र बोस मेडिकल कॉलेज से संबद्ध सुपर स्पेशलिटी अस्पताल एक बार फिर चर्चाओं में है। इस बार वजह कोई चिकित्सकीय उपलब्धि नहीं, बल्कि जेल से लाए जाने वाले कैदियों और बंदियों की अस्पताल में लंबी अवधि तक मौजूदगी को लेकर उठ रहे गंभीर सवाल हैं। सूत्रों के अनुसार कुछ कुख्यात अपराधी और विचाराधीन बंदी जेल में रहने के बजाय अस्पताल में भर्ती रहने को प्राथमिकता दे रहे हैं। इस पूरे घटनाक्रम ने जेल प्रशासन की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े कर दिए हैं।

जानकारी के अनुसार सुपर स्पेशलिटी अस्पताल में कई ऐसे मामले सामने आए हैं, जिनमें जेल से लाए गए बंदी सामान्य इलाज की अवधि समाप्त होने के बाद भी लंबे समय तक अस्पताल में भर्ती बने रहे। आरोप लगाए जा रहे हैं कि कुछ प्रभावशाली बंदी अस्पताल में भर्ती रहने के लिए विभिन्न स्तरों पर सेटिंग और प्रभाव का इस्तेमाल करते हैं, ताकि उन्हें जेल की सख्त निगरानी और प्रतिबंधों से राहत मिल सके।

‘भर्ती’ के नाम पर खेल की चर्चाएं
अस्पताल और जेल से जुड़े सूत्रों के बीच यह चर्चा आम है कि कुछ मामलों में बंदियों को अस्पताल में भर्ती कराने और उनकी अवधि बढ़वाने के लिए कथित रूप से बड़ी रकम का लेन-देन होता है। दावा किया जा रहा है कि गंभीर बीमारी या विशेष उपचार की आवश्यकता का हवाला देकर बंदियों को सुपर स्पेशलिटी अस्पताल में शिफ्ट कराया जाता है और फिर उनकी भर्ती अवधि बढ़ती चली जाती है।

कैदी से मिलने पहुंचे लोगों के बाद मचा था बवाल
कुछ समय पूर्व अस्पताल में भर्ती एक कैदी से मिलने बाहरी लोगों के पहुंचने का मामला भी सुर्खियों में आया था। बताया जाता है कि इस मुलाकात को लेकर अस्पताल परिसर और संबंधित पुलिस थाने में काफी देर तक हंगामे जैसी स्थिति बनी रही थी। इस घटना के बाद सुरक्षा व्यवस्था और बंदियों की निगरानी को लेकर कई सवाल उठे थे।जानकारों का कहना है कि यदि अस्पताल में भर्ती बंदियों से बाहरी लोगों की मुलाकातें बिना पर्याप्त निगरानी के हो रही हैं, तो यह सुरक्षा के लिहाज से गंभीर चिंता का विषय हो सकता है। ऐसे मामलों में न केवल अस्पताल प्रशासन बल्कि पुलिस और जेल प्रशासन की भूमिका भी जांच के दायरे में आ सकती है।

हाई प्रोफाइल मामलों ने बढ़ाई चर्चाएं
शहर में चर्चा का विषय रहे कुछ चर्चित मामलों में भी आरोपित अधिकारियों और कर्मचारियों के जेल जाने के बजाय लंबे समय तक अस्पताल में भर्ती रहने की घटनाएं सामने आई थीं। इनमें रिश्वतखोरी के मामलों में गिरफ्तार एक महिला पुलिस अधिकारी और एक परियोजना अधिकारी का नाम भी चर्चाओं में रहा। इन मामलों के बाद यह बहस तेज हुई कि आखिर जेल भेजे गए कुछ आरोपितों को अस्पताल में इतनी लंबी अवधि तक रहने की अनुमति कैसे मिल जाती है।

चिकित्सा आवश्यकता या सिस्टम का दुरुपयोग?
कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि किसी भी बंदी को स्वास्थ्य संबंधी समस्या होने पर उचित उपचार उपलब्ध कराना उसका संवैधानिक अधिकार है। लेकिन यदि चिकित्सा व्यवस्था का उपयोग जेल में रहने से बचने के साधन के रूप में किया जा रहा है, तो यह गंभीर प्रशासनिक विफलता मानी जाएगी।विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसे मामलों में स्वतंत्र मेडिकल बोर्ड द्वारा स्वास्थ्य परीक्षण, नियमित समीक्षा और भर्ती अवधि की निगरानी अनिवार्य की जानी चाहिए, ताकि वास्तव में बीमार बंदियों को उपचार मिले और व्यवस्था का दुरुपयोग न हो।

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