JABALPUR NEWS: दुर्लभ पैंक्रियास बीमारी पर एंडोस्कोपी की जीत, बिना ऑपरेशन बची युवक की जान

Endoscopy wins over rare pancreatic disease, patient survives without surgery




पैंक्रियास की जटिल बीमारी को बिना ऑपरेशन दी मात, एंडोस्कोपी से बची 30 वर्षीय युवक की जान

गैस्ट्रो न्यूरो क्लिनिक के विशेषज्ञ गैस्ट्रोएंटरोलॉजिस्ट डॉ. आलोक बंसल ने बताया कि जब किसी मरीज को गंभीर पैंक्रियाटाइटिस (पैंक्रियास में सूजन) का अटैक होता है तो पैंक्रियास के आसपास नेक्रोटिक कलेक्शन बनने लगते हैं। कई बार इस प्रक्रिया में पैंक्रियास की मुख्य नली (पैंक्रियाटिक डक्ट) बीच से गलकर अलग हो जाती है। इसके कारण पैंक्रियाटिक जूस आंतों में जाने के बजाय पेट और फेफड़ों में रिसने लगता है।

यह जूस जहां भी पहुंचता है वहां के ऊतकों को नुकसान पहुंचाने लगता है, जिससे तेज बुखार, हृदय गति बढ़ना, सांस फूलना, भूख खत्म होना, लगातार दस्त लगना और तेजी से वजन कम होने जैसी गंभीर समस्याएं पैदा हो जाती हैं। कई बार संक्रमण इतना बढ़ जाता है कि सामान्य दवाएं भी असर नहीं करतीं।

फेफड़े में पानी भरने से बढ़ी चिंता

30 वर्षीय मरीज रोशन जॉर्ज पहले किसी अन्य अस्पताल में एक्यूट पैंक्रियाटाइटिस के उपचार के लिए भर्ती था, लेकिन हालत में सुधार नहीं होने पर वह डॉ. बंसल के संपर्क में आया। उपचार के दौरान मरीज को ऑक्सीजन की कमी महसूस होने लगी। जांच में सामने आया कि उसके दाएं फेफड़े में 25 प्रतिशत से अधिक पानी भर चुका है।

विशेषज्ञों के अनुसार पैंक्रियाटाइटिस के मरीजों में आमतौर पर बाएं या दोनों फेफड़ों में पानी भरता है, लेकिन केवल दाएं फेफड़े में इतनी अधिक मात्रा में पानी होना असामान्य था। साथ ही पैंक्रियास के हेड हिस्से में नेक्रोटिक कलेक्शन भी मौजूद था। इन संकेतों के आधार पर चिकित्सकों ने डिस्कनेक्टेड पैंक्रियाटिक डक्ट सिंड्रोम की आशंका जताई।

25 से 30 प्रयासों के बाद मिली सफलता

स्थिति लगातार गंभीर होती जा रही थी। मरीज के पेट और फेफड़ों में पानी भर रहा था तथा लगातार बुखार और दस्त की शिकायत बनी हुई थी। कारण यह था कि पैंक्रियाटिक जूस आंतों में पहुंचने के बजाय शरीर के अन्य हिस्सों में रिस रहा था।

चिकित्सकों ने पहले फेफड़े से पानी निकाला और फिर एंडोस्कोपी आधारित ईआरसीपी (ERCP) प्रक्रिया की। इस दौरान पैंक्रियास की नली में तार डालकर टूटे हुए दोनों हिस्सों को जोड़ने की कोशिश की गई। करीब 25 से 30 प्रयासों के बाद चिकित्सकों को सफलता मिली और तार के माध्यम से अलग हुए हिस्सों को ब्रिज करते हुए स्टेंट स्थापित कर दिया गया।

स्टेंट लगते ही दिखने लगा सुधार

स्टेंट लगने के तुरंत बाद पैंक्रियाटिक जूस का प्रवाह पुनः आंतों की ओर शुरू हो गया। इसके बाद मरीज की स्थिति तेजी से सुधरने लगी। फेफड़ों और पेट में भरा पानी कम होने लगा, बुखार उतर गया, दस्त बंद हो गए और भोजन का पाचन सामान्य होने लगा।

चिकित्सकों ने बताया कि पैंक्रियास के हेड हिस्से में मौजूद नेक्रोटिक कलेक्शन, जिसका आकार लगातार बढ़ रहा था, वह भी धीरे-धीरे नगण्य होने लगा।

ऑपरेशन से बचा पैंक्रियास

विशेषज्ञों के अनुसार यदि यह प्रक्रिया सफल नहीं होती तो मरीज को बड़ी सर्जरी करानी पड़ सकती थी, जिसमें पैंक्रियास का प्रभावित हिस्सा निकालना पड़ता। ऐसी स्थिति में जीवनभर पाचन संबंधी दवाएं और इंसुलिन पर निर्भर रहने की संभावना रहती है। साथ ही संक्रमण और ऑपरेशन से जुड़े अन्य जोखिम भी बने रहते हैं।

करीब 40 से 45 दिनों तक चले उपचार, नियमित फॉलोअप, दवाओं के समायोजन, एंटीबायोटिक इंजेक्शन और विशेष डाइट के बाद अब मरीज पूरी तरह स्वस्थ है। मरीज ने चिकित्सकों का आभार व्यक्त करते हुए कहा कि एंडोस्कोपी आधारित इस उपचार ने न केवल उसकी जान बचाई बल्कि उसके पैंक्रियास को भी सुरक्षित रखा।

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