आखिर विपिन ताम्रकार पर इतनी मेहरबानी क्यों?: विवादों का ‘रिकॉर्ड’ और जिम्मेदारियों की ‘रफ्तार’…

 

जबलपुर। पुलिस विभाग में किसी अधिकारी की पहचान उसके अपराध नियंत्रण, कानून व्यवस्था और जनविश्वास से होती है, लेकिन कुछ अधिकारी ऐसे भी होते हैं जिनकी चर्चा उनके कार्यों से अधिक विवादों के कारण होती है। (टीआई) विपिन ताम्रकार का नाम पिछले कुछ वर्षों में ऐसे ही विवादों के केंद्र में रहा है। गांजा तस्करों को कथित राहत देने के मामले में निलंबन झेलने से लेकर देह व्यापार के कथित संरक्षण के आरोपों तक, उनके कार्यकाल पर लगातार सवाल उठते रहे हैं। इसके बावजूद विभागीय जिम्मेदारियां मिलती रहीं, जिससे पुलिस महकमे में भी तरह-तरह की चर्चाएं हैं।

पनागर में गांजा तस्करी प्रकरण ने हिलाया था पुलिस महकमा
विवादों की सबसे बड़ी शुरुआत उस समय हुई जब विपिन ताम्रकार पनागर थाने के प्रभारी थे। पुलिस मुख्यालय स्तर पर हुई समीक्षा में यह सामने आया कि गांजा तस्करी के तीन महत्वपूर्ण मामलों में आरोपियों को पकड़ने के बावजूद उनके खिलाफ एनडीपीएस एक्ट के तहत आवश्यक कार्रवाई नहीं की गई और उन्हें छोड़ दिया गया।मामले को गंभीर मानते हुए तत्कालीन आईजी प्रमोद वर्मा ने थाना प्रभारी विपिन ताम्रकार, एक उप निरीक्षक तथा दो सहायक उप निरीक्षकों को निलंबित कर दिया था। विभागीय कार्रवाई के दौरान यह माना गया कि इतनी गंभीर चूक केवल सामान्य लापरवाही नहीं मानी जा सकती।सूत्रों के अनुसार, इस कार्रवाई को उस समय पुलिस विभाग में नशा तस्करों के खिलाफ सख्ती का बड़ा संदेश माना गया था।

निलंबन के बाद फिर मिली महत्वपूर्ण जिम्मेदारी

सामान्यतः गंभीर विभागीय कार्रवाई के बाद किसी अधिकारी की अगली पदस्थापना को लेकर विशेष सतर्कता बरती जाती है, लेकिन विपिन ताम्रकार को बाद में फिर महत्वपूर्ण थाने की जिम्मेदारी मिल गई। इसी निर्णय ने विभाग के भीतर कई सवाल खड़े किए।पुलिस महकमे के जानकारों का कहना है कि जिन अधिकारियों के खिलाफ गंभीर अनुशासनात्मक कार्रवाई हो चुकी हो, उनके प्रदर्शन और कार्यशैली की लगातार निगरानी अपेक्षित होती है।

अधारताल में देह व्यापार के अड्डे पर उठे संरक्षण के आरोप

विवादों का सिलसिला अधारताल थाने में भी नहीं थमा। सुहागी क्षेत्र में संचालित एक कथित देह व्यापार के अड्डे पर कार्रवाई के बाद पूरे मामले ने नया मोड़ ले लिया।छापे के बाद थाना प्रभारी विपिन ताम्रकार पर आरोप लगे कि क्षेत्र में लंबे समय से चल रही गतिविधियों के बावजूद समय रहते प्रभावी कार्रवाई नहीं की गई। इतना ही नहीं, पुलिस संरक्षण दिए जाने जैसे गंभीर आरोप भी सामने आए।इन आरोपों के बाद वरिष्ठ अधिकारियों ने विपिन ताम्रकार को कारण बताओ नोटिस जारी कर स्पष्टीकरण मांगा। हालांकि इस मामले में अंतिम विभागीय निर्णय सार्वजनिक रूप से सामने नहीं आया, लेकिन नोटिस जारी होना ही मामले की गंभीरता को दर्शाता है।

एक के बाद एक विवाद, फिर भी सवाल वहीं
पनागर में गांजा तस्करी प्रकरण और अधारताल में देह व्यापार से जुड़े आरोप—दोनों मामलों ने एक समान प्रश्न खड़ा किया कि आखिर बार-बार ऐसे विवाद एक ही अधिकारी के कार्यकाल में क्यों सामने आए?यदि पहले प्रकरण में विभागीय कार्रवाई हो चुकी थी, तो क्या उसके बाद निगरानी और जवाबदेही की व्यवस्था पर्याप्त थी? यदि नहीं, तो इसका उत्तरदायित्व केवल थाना प्रभारी तक सीमित है या फिर विभागीय मॉनिटरिंग सिस्टम पर भी सवाल उठते हैं?

महकमे में चर्चा का विषय
पुलिस विभाग के भीतर भी यह चर्चा का विषय बना हुआ है कि जिन अधिकारियों के खिलाफ गंभीर प्रकृति की विभागीय कार्रवाई दर्ज हो चुकी हो, उनके मूल्यांकन का आधार क्या होना चाहिए। कानून व्यवस्था बनाए रखने की जिम्मेदारी निभाने वाले अधिकारी यदि स्वयं विवादों में घिरते हैं तो उसका सीधा असर पुलिस की साख पर पड़ता है।

जनविश्वास सबसे बड़ा सवाल
पुलिस पर जनता का विश्वास तभी मजबूत होता है जब कानून का पालन कराने वाली एजेंसी स्वयं निष्पक्ष और पारदर्शी दिखाई दे। नशा तस्करी और देह व्यापार जैसे मामलों में किसी भी स्तर पर लापरवाही या संरक्षण की आशंका पुलिस व्यवस्था की विश्वसनीयता को प्रभावित करती है।विपिन ताम्रकार से जुड़े दोनों प्रकरणों ने यही सवाल खड़ा किया है कि विभागीय कार्रवाई केवल औपचारिकता तक सीमित रहेगी या भविष्य में ऐसे मामलों में जवाबदेही तय करने की ठोस व्यवस्था भी दिखाई देगी।

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