जबलपुर।
रानी दुर्गावती विश्वविद्यालय (RDVV) की बुधवार को आयोजित ‘आपातिक’ कार्य परिषद (EC) की बैठक विश्वविद्यालय के इतिहास की सबसे विवादित बैठकों में शामिल हो सकती है। बंद कमरे में करीब साढ़े तीन घंटे तक चली बैठक में ऐसा घटनाक्रम सामने आया, जिसकी चर्चा अब पूरे विश्वविद्यालय परिसर में है। सूत्रों का दावा है कि जब बैठक में रखे गए दोनों अहम प्रस्तावों पर कार्य परिषद की सहमति नहीं बनी तो गोपनीय एजेंडा वापस लेकर कथित तौर पर वहीं फाड़ दिया गया।
यदि सूत्रों की बात सही है, तो यह पहला अवसर होगा जब ईसी बैठक में प्रस्तुत आधिकारिक एजेंडे का ऐसा हश्र हुआ हो।
‘सीक्रेट एजेंडा’ देखकर चौंक गए मेंबर्स
8 जुलाई को दोपहर 3 बजे एकात्म भवन में कुलगुरु प्रो. राजेश वर्मा की अध्यक्षता में आपातिक ईसी बैठक बुलाई गई थी। बैठक में अधिकांश सदस्य मौजूद थे, जबकि कुछ सदस्य अनुपस्थित रहे और एक सदस्य ऑनलाइन शामिल हुईं।
लेकिन बैठक की शुरुआत से पहले ही माहौल असामान्य हो गया। सूत्रों के मुताबिक, एजेंडा इतना गोपनीय रखा गया कि कुलसचिव तक को पूरी जानकारी नहीं थी कि चर्चा किन प्रस्तावों पर होगी। परंपरा के विपरीत इस बार एजेंडा सीधे कुलगुरु ने सदस्यों के सामने रखा। जैसे ही सदस्यों ने प्रस्ताव पढ़े, बैठक का माहौल बदल गया।
पहला मुद्दा: 13 कर्मचारियों के नियमितीकरण पर फिर से सवाल
सूत्रों के अनुसार पहला प्रस्ताव हाल ही में नियमित किए गए 13 कर्मचारियों से जुड़ा था। बताया जाता है कि इस मामले में नई समिति बनाने या पहले जारी आदेश में संशोधन का प्रस्ताव रखा गया।
लेकिन कार्य परिषद के अधिकांश सदस्यों ने इस पर हाथ खड़े कर दिए।
उनका स्पष्ट मत था कि यह प्रशासनिक विषय है और यदि 30 मार्च की ईसी बैठक के निर्णय के आधार पर आदेश जारी हुआ है तो अब उसमें संशोधन का निर्णय भी प्रशासन स्वयं ले। ईसी को बाद में विवादों में घसीटना उचित नहीं होगा।
सूत्र बताते हैं कि कुलसचिव ने भी अपने आदेश में संशोधन से साफ इनकार कर दिया। उनका कहना था कि आदेश कार्य परिषद के पूर्व निर्णय के अनुरूप ही जारी हुआ है।
दूसरा मुद्दा: रिजल्ट टेंडर पर फंसी पूरी कहानी
बैठक का दूसरा और शायद सबसे संवेदनशील मुद्दा परीक्षा परिणाम और अंकसूची तैयार करने वाली एजेंसी से जुड़ा था।
जानकारी के अनुसार वर्ष 2025 में हुई निविदा प्रक्रिया में दिल्ली की एक कंपनी सबसे कम दर (L-1) पर चयनित हुई थी, लेकिन आश्चर्यजनक रूप से डेढ़ साल बाद भी उसे कार्यादेश जारी नहीं किया गया।
सूत्रों का दावा है कि बैठक में प्रस्ताव रखा गया कि फिलहाल पुराने ठेकेदार से ही परीक्षा परिणाम और मार्कशीट तैयार करा ली जाए।
यहीं पर ईसी सदस्यों ने कड़ा विरोध दर्ज कराया।
सदस्यों का तर्क था कि यदि निविदा प्रक्रिया पूरी हो चुकी है और नई कंपनी सबसे कम दर पर चयनित है, तो पुराने ठेकेदार को काम देने से न केवल वित्तीय अनियमितता के सवाल उठेंगे, बल्कि भविष्य में ऑडिट आपत्तियां और कानूनी विवाद भी खड़े हो सकते हैं।
कुछ सदस्यों ने साफ कहा कि यदि प्रशासन ऐसा निर्णय लेना चाहता है तो वह अपने स्तर पर ले, लेकिन कार्य परिषद को उसकी ढाल न बनाया जाए।
जब नहीं चली बात… तो फट गया एजेंडा!
सूत्रों के मुताबिक दोनों प्रमुख प्रस्तावों पर सहमति नहीं बनने के बाद बैठक का माहौल पूरी तरह गर्म हो गया। बहस तेज होती गई और अंततः अध्यक्ष ने सदस्यों से एजेंडे की प्रतियां वापस ले लीं।
इसके बाद जो हुआ, वह विश्वविद्यालय की कार्यशैली पर बड़ा सवाल खड़ा करता है।
सूत्रों का दावा है कि एजेंडे की प्रतियां वहीं फाड़ दी गईं, ताकि प्रस्तावों का कोई लिखित रिकॉर्ड बाहर न जा सके। हालांकि इस पूरे घटनाक्रम की किसी भी सदस्य ने आधिकारिक पुष्टि नहीं की है, लेकिन विश्वविद्यालय के गलियारों में यही चर्चा सबसे ज्यादा गर्म है।
कुलगुरु बनाम कुलसचिव?
बैठक के बाद सबसे बड़ी चर्चा कुलगुरु और कुलसचिव के बीच बढ़ते मतभेदों को लेकर है।
विश्वविद्यालय के जानकारों का कहना है कि पहली बार ऐसा माहौल देखने को मिला जब कार्य परिषद के कई सदस्य कुलगुरु की अपेक्षा कुलसचिव की प्रशासनिक दलीलों के अधिक करीब दिखाई दिए।
यदि यह स्थिति बनी रहती है तो आने वाले दिनों में विश्वविद्यालय की प्रशासनिक व्यवस्था और निर्णय प्रक्रिया पर इसका व्यापक असर पड़ सकता है।
उठ रहे बड़े सवाल
- यदि एजेंडा इतना महत्वपूर्ण था तो उसे गोपनीय क्यों रखा गया?
- क्या कुलसचिव को एजेंडे की पूरी जानकारी थी?
- 13 कर्मचारियों के मामले को दोबारा ईसी में लाने की जरूरत क्यों पड़ी?
- L-1 कंपनी को डेढ़ साल बाद भी कार्यादेश क्यों नहीं मिला?
- पुराने ठेकेदार को फिर से काम देने की जरूरत आखिर क्यों महसूस हुई?
- क्या वास्तव में बैठक में आधिकारिक एजेंडा फाड़ा गया? यदि हां, तो उसका रिकॉर्ड अब कहां है?
