वेटरनरी विवि के असिस्टेंट प्रोफेसर का कारनामाः भोपाल में प्रभारी प्राचार्य, राजस्थान में भी सक्रियता?

 

जबलपुर। नानाजी देशमुख पशुचिकित्सा विज्ञान विश्वविद्यालय से संबद्ध महाविद्यालय पशुपालन डिप्लोमा कॉलेज, भोपाल के प्रभारी प्राचार्य डॉ. गौरव साहू को लेकर गंभीर आरोप सामने आए हैं। उपलब्ध दस्तावेजी प्रमाणों और सार्वजनिक रूप से उपलब्ध जानकारी के आधार पर दावा किया जा रहा है कि डॉ. साहू भोपाल स्थित कॉलेज में प्रभारी प्राचार्य के पद पर कार्यरत रहते हुए समानांतर रूप से राजस्थान स्थित एक अन्य संस्थान/कॉलेज में भी नियमित रूप से सेवाएं दे रहे हैं।

इस मामले ने विश्वविद्यालय प्रशासन की कार्यप्रणाली, नियुक्ति प्रक्रिया, सेवा शर्तों और संस्थागत पारदर्शिता पर कई सवाल खड़े कर दिए हैं। शिकायतकर्ताओं का कहना है कि यदि यह तथ्य सही पाए जाते हैं, तो यह केवल प्रशासनिक लापरवाही नहीं, बल्कि सेवा नियमों, नियुक्ति शर्तों और आचरण संबंधी प्रावधानों के संभावित उल्लंघन का गंभीर मामला हो सकता है।

जानकारी के अनुसार, डॉ. गौरव साहू वर्तमान में भोपाल के पशुपालन डिप्लोमा कॉलेज में प्रभारी प्राचार्य के रूप में जिम्मेदारी संभाल रहे हैं। इसी दौरान उनके राजस्थान स्थित एक अन्य संस्थान से भी जुड़े होने और वहां नियमित रूप से कार्य किए जाने को लेकर सवाल उठाए गए हैं। आरोप लगाने वालों का कहना है कि कोई भी अधिकारी या कर्मचारी एक संस्थान में पदस्थ रहते हुए बिना सक्षम अनुमति के दूसरे संस्थान में नियमित सेवा कैसे दे सकता है, यह जांच का विषय है।

मामले से जुड़े पक्षों ने इस संबंध में दस्तावेज और अन्य सहायक सामग्री उपलब्ध कराते हुए मांग की है कि विश्वविद्यालय प्रशासन, संबंधित विभाग और सक्षम जांच एजेंसियां पूरे प्रकरण की निष्पक्ष जांच करें। उनका कहना है कि उच्च शिक्षा और पशुचिकित्सा शिक्षा जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों में पदों की जवाबदेही बेहद जरूरी है। यदि जिम्मेदार पदों पर बैठे अधिकारी सेवा नियमों का पालन नहीं करते हैं, तो इसका सीधा असर संस्थान की साख, छात्रों की पढ़ाई और प्रशासनिक व्यवस्था पर पड़ता है।

शिकायतकर्ताओं ने यह भी सवाल उठाया है कि यदि डॉ. साहू राजस्थान स्थित संस्थान में भी कार्यरत थे या हैं, तो क्या इसकी जानकारी विश्वविद्यालय प्रशासन को थी? क्या इसके लिए विधिवत अनुमति ली गई थी? क्या दोनों संस्थानों में उपस्थिति, वेतन, मानदेय या अन्य सेवा संबंधी लाभ लिए गए? और यदि ऐसा हुआ है तो इसकी जवाबदेही किसकी होगी?

इस पूरे मामले को जनहित से जुड़ा बताते हुए निष्पक्ष पत्रकारिता जांच और तथ्यों के सत्यापन की मांग की गई है। शिकायतकर्ताओं का कहना है कि दस्तावेजों की जांच, संबंधित संस्थानों से जानकारी और सेवा अभिलेखों के मिलान के बाद ही वास्तविक स्थिति स्पष्ट हो सकेगी।

वहीं, इस मामले में अब विश्वविद्यालय प्रशासन की भूमिका भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है। यदि आरोपों में सच्चाई पाई जाती है तो संबंधित अधिकारी के खिलाफ सेवा नियमों के अनुसार कार्रवाई की जा सकती है। साथ ही यह भी जांच का विषय होगा कि इतने लंबे समय तक यह मामला प्रशासन की जानकारी में क्यों नहीं आया।

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