हर्षा रिछारिया बनीं साध्वी हर्षानंद गिरी, नर्मदा तट पर लिया 11 दिन की तपस्या का संकल्प

नर्मदा तट से शुरू हुई साध्वी हर्षानंद गिरी की 11 दिवसीय कठोर तपस्या, विश्व शांति और गौ संरक्षण के लिए लिया मौन व्रत

जबलपुर। आध्यात्मिक जगत में इन दिनों चर्चा का विषय बनीं साध्वी हर्षानंद गिरी ने गुरुवार को संस्कारधानी जबलपुर के पवित्र नर्मदा तट ग्वारीघाट पहुंचकर अपनी 11 दिवसीय विशेष साधना का शुभारंभ किया। मां नर्मदा में स्नान और पूजा-अर्चना के बाद उन्होंने मौन व्रत धारण किया तथा एकांतवास के लिए रवाना हो गईं। यह विशेष साधना 5 जून से शुरू होकर 15 जून तक चलेगी, जिसमें वे अन्न त्याग, मौन व्रत, जूते-चप्पलों का त्याग और पूर्ण एकांतवास का पालन करेंगी।

साध्वी हर्षानंद गिरी का यह आध्यात्मिक संकल्प उस समय चर्चा में आया है, जब कुछ समय पहले ही उन्होंने धर्म नगरी उज्जैन में आयोजित एक विशेष धार्मिक अनुष्ठान के दौरान पुनः संन्यास ग्रहण किया था। संन्यास दीक्षा के बाद उन्हें नया नाम साध्वी हर्षानंद गिरी प्रदान किया गया। उन्होंने संत सुमिनानंद महाराज से विधिवत संन्यास दीक्षा लेकर सांसारिक जीवन का त्याग कर पूर्ण रूप से आध्यात्मिक मार्ग को अपनाने का संकल्प लिया है।

ग्वारीघाट में धार्मिक वातावरण के बीच लिया संकल्प

गुरुवार सुबह साध्वी हर्षानंद गिरी ग्वारीघाट पहुंचीं, जहां उन्होंने मां नर्मदा के दर्शन किए और विधि-विधान से पूजन-अर्चन किया। इसके बाद नर्मदा जल में आस्था की डुबकी लगाकर मौन व्रत धारण किया। इस दौरान उनके साथ संत समाज के कई सदस्य और श्रद्धालु भी मौजूद रहे।

धार्मिक मंत्रोच्चार और वैदिक विधि के बीच साध्वी ने आगामी 11 दिनों तक कठोर तपस्या करने का संकल्प लिया। संकल्प के बाद उन्होंने किसी भी प्रकार का सार्वजनिक संवाद बंद कर दिया और साधना स्थल के लिए रवाना हो गईं।

11 दिनों तक करेंगी कठोर अनुशासन का पालन

जानकारी के अनुसार साध्वी हर्षानंद गिरी की यह साधना सामान्य धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि एक विशेष तप साधना है। इस दौरान वे कई प्रकार के कठोर नियमों का पालन करेंगी।

साधना अवधि में वे—

  • पूर्ण मौन व्रत रखेंगी।
  • अन्न का त्याग करेंगी।
  • जूते-चप्पलों का उपयोग नहीं करेंगी।
  • जनसंपर्क और सार्वजनिक गतिविधियों से दूर रहेंगी।
  • पूर्ण एकांतवास में रहकर ध्यान, जप और साधना करेंगी।
  • आध्यात्मिक चिंतन और राष्ट्र कल्याण की भावना से तपस्या करेंगी।

धार्मिक जानकारों के अनुसार अधिक मास को सनातन परंपरा में विशेष साधना और तप का काल माना जाता है। इसी कारण साध्वी ने अधिक मास के अंतिम दिनों को अपनी साधना के लिए चुना है।

विश्व शांति और गौ माता के सम्मान के लिए साधना

साध्वी हर्षानंद गिरी ने मौन व्रत धारण करने से पहले अपने संदेश में कहा कि वर्तमान समय में विश्व के कई हिस्सों में संघर्ष और तनाव का वातावरण है। युद्ध और अशांति का सबसे अधिक दुष्प्रभाव गरीब और कमजोर वर्ग पर पड़ता है। उन्होंने कहा कि उनकी साधना का उद्देश्य विश्व में शांति और सद्भाव की कामना करना है।

उन्होंने यह भी कहा कि गौ माता भारतीय संस्कृति और सनातन परंपरा का महत्वपूर्ण आधार हैं। गौ संरक्षण और गौ माता को राष्ट्रीय पशु का दर्जा दिलाने की भावना भी उनकी साधना का प्रमुख उद्देश्य है।

साध्वी ने कहा कि उनका यह तप किसी व्यक्तिगत उपलब्धि के लिए नहीं, बल्कि समाज, राष्ट्र और समस्त मानवता के कल्याण की भावना से प्रेरित है।

संन्यास के बाद पहला बड़ा आध्यात्मिक अनुष्ठान

उज्जैन में संन्यास ग्रहण करने के बाद यह साध्वी हर्षानंद गिरी का पहला बड़ा सार्वजनिक आध्यात्मिक अनुष्ठान माना जा रहा है। संन्यास के पश्चात उन्होंने स्वयं को पूरी तरह आध्यात्मिक साधना, धर्म प्रचार और समाज सेवा के कार्यों के लिए समर्पित करने की घोषणा की थी।

धार्मिक क्षेत्र से जुड़े लोगों का मानना है कि नर्मदा तट से शुरू हुई यह 11 दिवसीय तपस्या उनके आध्यात्मिक जीवन का एक महत्वपूर्ण पड़ाव साबित हो सकती है। वहीं उनके समर्थकों और श्रद्धालुओं में भी इस विशेष साधना को लेकर उत्साह और श्रद्धा का माहौल देखा जा रहा है।

15 जून को होगा साधना का समापन

साध्वी हर्षानंद गिरी की यह विशेष साधना 15 जून को पूर्ण होगी। इसके बाद वे पुनः सार्वजनिक रूप से श्रद्धालुओं के बीच उपस्थित होकर अपने अनुभव साझा कर सकती हैं। फिलहाल वे पूर्ण मौन और एकांतवास में रहकर ध्यान, जप और तपस्या में लीन रहेंगी।

नर्मदा तट से शुरू हुई इस साधना ने धार्मिक और आध्यात्मिक जगत का ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया है। अब श्रद्धालुओं की नजर 15 जून पर टिकी है, जब उनकी 11 दिवसीय तपस्या का समापन होगा।

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