JABALPUR NEWS- बेगमगंज सीड कंपनी के 9 लोगों पर एफआईआर,: फर्जी नियुक्तियां, नकली किसान सूची और 39.67 लाख की हेराफेरी

 जांच में खुला बड़ा फर्जीवाड़ा

जबलपुर। जिले में उपार्जन कार्य से जुड़ा एक बड़ा कथित वित्तीय घोटाला सामने आया है। पाटन थाना पुलिस ने कृषि विभाग की जांच रिपोर्ट के आधार पर बेगमगंज सीड प्रोड्यूसर लिमिटेड कंपनी के छह डायरेक्टरों और तीन कर्मचारियों के खिलाफ धोखाधड़ी, कूटरचना और शासन को आर्थिक क्षति पहुंचाने के आरोप में एफआईआर दर्ज की है। जांच में सामने आया है कि कंपनी ने कथित रूप से फर्जी दस्तावेज तैयार कर, संदिग्ध नियुक्तियां दिखाकर और किसानों की कूटरचित सूची प्रस्तुत कर शासन से लाखों रुपये का भुगतान हासिल किया।

मामले की शिकायत किसान मजदूर महासंघ के जिलाध्यक्ष राजेन्द्र सिंह (राजेश सिंह) ठाकुर ने की थी। शिकायत के बाद कलेक्टर के निर्देश पर गठित जांच दल ने पूरे मामले की जांच की। जांच रिपोर्ट में कई गंभीर अनियमितताओं का खुलासा होने के बाद कृषि विभाग ने एफआईआर दर्ज कराने की अनुशंसा की, जिसके आधार पर पाटन थाना में अपराध पंजीबद्ध किया गया है।

कलेक्टर के आदेश पर हुई थी जांच

जानकारी के अनुसार किसान मजदूर महासंघ की शिकायत के बाद कलेक्टर जबलपुर द्वारा 19 फरवरी 2026 को जांच दल गठित किया गया था। जांच दल को बेगमगंज सीड प्रोड्यूसर लिमिटेड कंपनी द्वारा उपार्जन कार्य के लिए प्रस्तुत दस्तावेजों, कर्मचारियों की नियुक्तियों, वित्तीय रिकॉर्ड और किसानों की सदस्यता सूची की जांच करने के निर्देश दिए गए थे।

कई स्तरों पर दस्तावेजों की पड़ताल और संबंधित अभिलेखों के सत्यापन के बाद जांच दल ने अपनी रिपोर्ट प्रशासन को सौंपी। रिपोर्ट में कंपनी के संचालकों और कर्मचारियों की भूमिका संदिग्ध पाई गई।

नियुक्ति आदेशों में मिला फर्जीवाड़ा

जांच के दौरान कंपनी द्वारा जारी किए गए नियुक्ति आदेशों की जांच की गई। रिपोर्ट के अनुसार कंपनी ने मनीष चौरसिया, नीलेश विश्वकर्मा और कमलेश साहू की नियुक्ति से जुड़े आदेश प्रस्तुत किए थे। इनमें से एक आदेश 20 फरवरी 2023 का था, जबकि दूसरा आदेश 1 दिसंबर 2022 की नियुक्ति से संबंधित बताया गया।

जांच अधिकारियों को सबसे बड़ी विसंगति यह मिली कि इन नियुक्तियों के समर्थन में कोई प्रस्ताव, बैठक का निर्णय, संचालक मंडल की स्वीकृति अथवा अन्य वैधानिक दस्तावेज उपलब्ध नहीं कराए गए। इतना ही नहीं, दोनों नियुक्ति आदेशों में अलग-अलग हस्ताक्षर पाए गए, जिससे दस्तावेजों की प्रामाणिकता पर सवाल खड़े हो गए। जांच दल ने इन्हें प्रथम दृष्टया कूटरचित दस्तावेज माना।

बैंक खाते के नाम पर भी गड़बड़ी

उपार्जन कार्य के लिए निर्धारित नियमों के अनुसार संबंधित संस्था के बैंक खाते में कम से कम 50 लाख रुपये की राशि या उतनी क्रेडिट लिमिट होना आवश्यक है। कंपनी ने जांच के दौरान आईसीआईसीआई बैंक का एक खाता प्रस्तुत किया और दावा किया कि उक्त खाते के माध्यम से वित्तीय पात्रता पूरी की गई है।

लेकिन जब जांच अधिकारियों ने बैंक खाते का सत्यापन कराया तो चौंकाने वाला तथ्य सामने आया। रिपोर्ट में उल्लेख किया गया कि प्रस्तुत बैंक खाता बेगमगंज सीड प्रोड्यूसर लिमिटेड कंपनी के नाम पर ही नहीं था। इससे यह संदेह और गहरा गया कि उपार्जन कार्य की पात्रता प्राप्त करने के लिए भ्रामक और गलत जानकारी प्रस्तुत की गई।

किसानों की सूची निकली संदिग्ध

जांच का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा कंपनी द्वारा प्रस्तुत किसानों की सदस्यता सूची रही। जांच दल ने पाया कि सूची में किसानों के नाम तो दर्ज थे, लेकिन उनके पते, गांव, तहसील, जिला और शेयर राशि जैसी महत्वपूर्ण जानकारियां नहीं थीं।

जब जांच दल ने सूची में दर्ज मोबाइल नंबरों पर संपर्क किया तो कई लोगों ने साफ तौर पर कहा कि वे कंपनी के सदस्य नहीं हैं और न ही उन्हें कंपनी के बारे में कोई जानकारी है। इससे यह आशंका और मजबूत हो गई कि सदस्यता सूची वास्तविक नहीं थी और दस्तावेज तैयार कर केवल पात्रता साबित करने का प्रयास किया गया।

जांच रिपोर्ट में इस सूची को भी कूटरचित और भ्रामक बताया गया है।

39.67 लाख रुपये के भुगतान पर उठे सवाल

मध्यप्रदेश राज्य सहकारी विपणन संघ मर्यादित, जिला जबलपुर द्वारा उपलब्ध कराए गए भुगतान संबंधी रिकॉर्ड की भी जांच की गई। दस्तावेजों के अनुसार कंपनी को उपार्जन कार्य के लिए विभिन्न मदों में कुल 39 लाख 67 हजार 781 रुपये का भुगतान किया गया था।

जांच रिपोर्ट में आरोप लगाया गया है कि यह राशि फर्जी और कूटरचित दस्तावेजों के आधार पर प्राप्त की गई। जांच दल का मानना है कि कंपनी के संचालकों और कर्मचारियों ने आपसी मिलीभगत से दस्तावेज तैयार कर शासन से यह भुगतान हासिल किया, जिससे सरकारी खजाने को आर्थिक नुकसान हुआ।

कृषि विभाग ने कराया मामला दर्ज

जांच रिपोर्ट के आधार पर उपसंचालक किसान कल्याण एवं कृषि विकास कार्यालय ने एफआईआर दर्ज कराने का निर्णय लिया। इसके लिए सहायक संचालक कृषि रवि कुमार आम्रवंशी को अधिकृत किया गया। उन्होंने पाटन थाना पहुंचकर पूरी जांच रिपोर्ट और संबंधित दस्तावेज पुलिस को सौंपे।

पुलिस ने शिकायत और जांच प्रतिवेदन का परीक्षण करने के बाद प्रथम दृष्टया अपराध पाए जाने पर मामला दर्ज कर लिया।

इन लोगों को बनाया गया आरोपी

एफआईआर में कंपनी के छह डायरेक्टर और तीन कर्मचारियों को आरोपी बनाया गया है। इनमें—

सचिन दुबे
रंजना पांडे
संदीप दुबे (ग्राम उड़ना, थाना पाटन)
अंशुल बर्मन
नेहा पांडे
उमा सिंह
मनीष चौरसिया
कमलेश साहू
नीलेश विश्वकर्मा
शामिल हैं।

पुलिस शुरू करेगी दस्तावेजों की फोरेंसिक जांच
पुलिस सूत्रों के अनुसार अब जांच के दौरान नियुक्ति आदेशों, बैंक दस्तावेजों, सदस्यता सूची और भुगतान से जुड़े रिकॉर्ड की बारीकी से पड़ताल की जाएगी। आवश्यकता पड़ने पर दस्तावेजों को हस्तलेखन और फोरेंसिक परीक्षण के लिए भी भेजा जा सकता है। इसके अलावा बैंक रिकॉर्ड, कंपनी के वित्तीय लेन-देन और संबंधित अधिकारियों के बयान भी दर्ज किए जाएंगे।
यदि जांच में आरोप सही पाए जाते हैं तो यह मामला केवल धोखाधड़ी तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि सरकारी धन के दुरुपयोग और संगठित आर्थिक अपराध के रूप में भी सामने आ सकता है।

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